संवाद सहयोगी, कोडरमा : कोरोना महामारी को देखते हुए मुस्लिम समुदाय के लोगों ने नो शापिग फार ईद का अभियान चला रखा है। लिहाजा इस बार की ईद बहुत सादगी के साथ सरकार के गाइडलाइन के अनुसार मनाया जाना है। प्रशासन द्वारा कहा गया है कि शारीरिक दूरी का पालन करते हुए ईदगाह या मस्जिद में जमा नहीं होना है। एक-दूसरे से गले मिलना भी मुश्किल है। यह दूसरा मौका है जब मुस्लिम समुदाय के लोग ईद सादगी के साथ बिना किसी से मिले घर पर रह कर ही मनाएंगे। वहीं ज्यादातर लोग नए कपड़े नहीं पहनेंगे, और न इस बार मुस्लिम मोहल्ले गुलजार होंगे न सजेंगे। मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा कहा जा रहा है कि जब मस्जिदों में नमाज बंद है, तरावीह बंद है, मस्जिदें वीरान है, तो इस बार ईद का भी सेलिब्रेशन होना उचित नहीं। हम नए कपड़े, जूता, चप्पल, ज्वैलरी क्यों खरीदें, जब हमारा मुल्क अभी संकट की घड़ी से गुजर रहा है। लॉकडाउन में घर पर ही रह कर परिवार के साथ ईद मानना है। घर के बाहर व रहने वाले बाजारों में सन्नाटा पसरा है। ईद रमजान का तोहफा :

ईद-उल-फितर भूख-प्यास सहन करके एक महीने तक खुदा की ईबादत करने वाले रोजेदारों को अल्लाह का इनाम तोहफा है। सेवइयों में लिपटी मोहब्बत की मिठास इस त्योहार की खूबी है, पर इस लॉकडाउन में संवाइयों की मिठास कहीं गुम हो गई है। मुसलमानों का सबसे बड़ा त्योहार कहा जाने वाला ईद का पर्व न सिर्फ हमारे समाज को जोड़ने का मजबूत सूत्र है, बल्कि यह इस्लाम के प्रेम और सौहार्द भरे संदेश को फैलाता है। मीठी ईद भी कहा जाने वाला यह पर्व खास तौर पर भारतीय समाज के ताने-बाने और उसकी भाईचारे की सदियों पुरानी परंपरा का वाहक है। इस दिन मुस्लिम धर्म के लोग गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे से गले मिलते हैं और एक दूसरे के घरों में जाकर सेवइयां खाकर कड़वाहट को मिठास में बदलते हैं। साथ ही दूसरे समाज धर्म के लोग भी इस बेमिसाल अनूठे परम्परा में शामिल होकर एक दूसरे को ईद की मुबारकबाद देते नजर आते हैं। परन्तु इस बार यह परंपरा घरों तक सीमित रहेगा। बहरहाल मुस्लिम उलेमाओं की मानें तो गुरुवार को चांद देख शुक्रवार को ईद उल फितर का त्योहार मनाया जाएगा।