जागरण संवाददाता, जमशेदपुर : दिशुआ सेंदरा पर्व की पहचान वैसे तो शिकार पर्व के रूप में है, लेकिन इस पर्व पर आदिवासी समुदाय के लोग जंगल की तलहटी पर जो पारंपरिक पूजा-अर्चना करते हैं, उसमें प्रकृति को संरक्षित व सुरक्षित रखने की मन्नत भी मांगी जाती है। यही नहीं, वन में जंगली जानवरों की संख्या बढ़ने व वन्यजीवों के फलने-फूलने की भी प्रार्थना की जाती है। इस बार भी ऐसी ही पूजा-अर्चना सेंदरा पर्व के 'गिपितिज टांडी' यानी ठहराव स्थल पर होगी। फदलोगोड़ा स्थित गिपितिज टांडी में दलमा राजा राकेश हेम्ब्रम पूजा अर्चना करेंगे। हेम्ब्रम कहते हैं कि आदिवासी समुदाय की पहचान प्रकृति से है। ऐसे में इस बात को बेवजह इतना प्रचारित किया गया कि सेंदरा पर्व का आयोजन सिर्फ और सिर्फ जंगली जानवरों के शिकार के लिए किया जाता है। जबकि ऐसा है नहीं। हां, इस पर्व पर शिकार करने की परंपरा है, लेकिन इसके साथ ही यह वन्यजीवों की संरक्षा व सुरक्षा का भी पर्व है। गौरतलब हो कि इस बार दलमा वन में 8 मई को सेंदरा पर्व का आयोजन किया जाना है। हर साल सेंदरा में हिस्सा लेने वाले रायसेन सोरेन बताते हैं कि सेंदरा सिर्फ शिकार का पर्व नहीं, बल्कि इसके माध्यम से जानवरों के जनसंख्या नियंत्रण व जानवरों का प्रजनन कराया जाता है। सोरेन तर्क देते हुए बताते हैं कि सेंदरा के दौरान आदिवासी समुदाय के लोग चुपचाप जंगल में प्रवेश नहीं करते, बल्कि ढोल-नगाड़े बजाते हुए जंगल में प्रवेश करते हैं, ताकि जानवर चौकन्ने हो जाएं। इसका असर यह होता है कि इतने बड़े जंगल में अलग-थलग पड़े जानवर बिदक कर एक और चले जाएं। इससे जंगल में बिछड़े नर व मादा जानवरों को प्रजनन का अवसर मिल सके। आठ मई को इसी परंपरा को पूरा करने के लिए सेंदरा का आयोजन किया जाएगा।

Posted By: Jagran

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