जमशेदपुर, गुरदीप राज। Weekly News Roundup Jamshedpur daphtarnaama ये हैं जनाब एमके साहू। टाटानगर में आरपीएफ इंस्पेक्टर के पद पर तैनात हैं। इन्हें यहां आए हुए अभी कुछ ही महीने हुए हैं, लेकिन अभी से ही लोग त्राहिमाम कर रहे हैं। आलम यह है कि जब साहब को फोन लगाओ तो व्यस्त रहते हैं।

अगर चार से पांच बार फोन लगा दिया तो ब्लॉक लिस्ट में शामिल होने के लिए तैयार हो जाइए। कहीं आग लग जाए या धरती फट जाए, साहब को क्या। ना सूचना मिलेगी, ना काम करना होगा। चैन की बंसी बजाते रहिए। मीडिया कर्मियों को देख कर उनकी रूह कांप जाती है। उनका फोन नहीं उठाते हैं। कभी उठा भी लिए तो जवाब मिलेगा- बड़े साहब से पूछ लीजिए। अब साहू जी को कौन समझाए, सब काम बड़े साहब ही करेंगे तो आपकी क्या जरूरत है। खुद भी तो जिम्मेवारी उठाइए। साहब की एक खूबी और, अपनी पीठ थपथपाने का मौका कभी नहीं छोड़ते।

इंतजार में पथरा गई आंखें

चक्रधरपुर मंडल के डीआरएम वीके साहू ने टाटानगर के अधिकारियों की नींद उड़ा दी है। हर दफ्तर में यही चर्चा-ए-आम है, साहब ने जीना दूभर कर दिया है। बिना सूचना दिए चक्रधरपुर से टाटानगर स्टेशन पहुंच जाते हैं। आलम यह है कि दफ्तर से बाहर निकलने से पहले झांकते हैं, कहीं साहब निरीक्षण तो नहीं कर रहे हैं। कहीं नजर आ गए तो ड्यूटी खत्म होने के बाद भी अपने कार्यालय में जमे रहना पड़ता है। हलक सूख रहा हो या फिर पेट में चूहे कूद रहे हों, कोई फिक्र नहीं। फिक्र तो नौकरी बचाने की है। शनिवार की सुबह करीब 11.20 बजे डीआरएम स्टेशन पहुंचे और केंद्रीय विद्यालय एक कार्यक्रम में शिरकत करने चले गए। शाम 4.30 बजे तक टाटानगर स्टेशन वापस नहीं लौटे। साहब के इंतजार में भूखे पेट भजन करने को मजबूर थे अधिकारी। पांच बजे साहब के दर्शन हुए तो सभी ने चैन की सांस ली।

देखकर फूलने लगते हाथ-पांव

डीआरएम साहब क्या हुए, भूत हो गए। टाटानगर स्टेशन पर इन्हें देखते ही सभी के हाथ-पांव फूलने लगते हैं। आरपीएफ थानेदार की स्थिति ऐसी हो जाती है कि काटो तो खून नहीं। डीआरएम के स्टेशन पहुंचने के पहले आस-पास के इलाकों की 'सफाई' शुरू कर देते हैं। थाने के बाहर लगे अवैध स्टाल और खोमचा वालों को खदेड़ कर दूर भगा देते हैं। इस दौरान उनका चेहरा देखने लायक होता है। हांफते-कांपते नजर आते हैं। जब तक डीआरएम टाटानगर में रहते हैं, उनकी सांस उल्टी लटकी रहती है। साहब के जाते ही ऑफिस में कुर्सी पर धड़ाम से गिरते हैं। डीआरएम की जाने की खबर हवा में भी तैरने लगती है और शाम होते-होते फिर से सड़क किनारे बाजार सज जाती है। काश, डीआरएम साहब, यहीं के हो जाते। टाटानगर स्टेशन व उसके आसपास का इलाका हमेशा चकाचक रहता। सुबह से शाम तक दर्जनों बार टाटानगर स्टेशन की सफाई होती।

एक चोर दरवाजा भी है..

यह कहानी है टाटानगर रेलवे स्टेशन की। यहां जब यात्रियों का गुस्सा परवान चढ़ता है तो स्टेशन मास्टर के दफ्तर में उतारने के लिए पहुंच जाते हैं। यहां शिकायत पुस्तिका मांगते हैं। फिर तमतमाए लहजे में शिकायतें दर्ज करते हैं। फिर शिकायत पुस्तिका घूमने लगती है। इस दफ्तर से उस दफ्तर। बेचारी कई दिनों तक घूमती है। लेकिन, होता कुछ नहीं। हां, कोई शिकायतकर्ता अगर पीछे ही पड़ जाता तो चक्रधरपुर रेल मंडल को भी सक्रिय होना पड़ता है। फिर कार्रवाई होती है। अब शिकायतों की क्वालिटी भी जान लीजिए- एसी खराब है। कोच में पानी ही नहीं है। टीटीई ने अभद्र व्यवहार किया। कई बार ट्रेन छूटने पर यात्री स्टेशन मास्टर के दफ्तर में घुस जाते हैं। बवाल शुरू कर देते हैं। अब राज की बात जान लीजिए- यहां जान बचाने के लिए दफ्तर के पीछे एक चोर रास्ता भी बनाया गया है, ताकि हमला होने पर भाग सकें।

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