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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 01, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

झारखंड के इस गांव में कोई नहीं पीता शराब

By Sachin MishraEdited By:
Published: Sun, 01 Oct 2017 09:15 AM (IST)Updated: Sun, 01 Oct 2017 04:41 PM (IST)

झारखंड में एक ऐसा आदिवासी बहुल गांव है, जहां गत 25 वर्षों से खुद ग्रामीणों ने शराबबंदी लागू कर रखी है।

झारखंड के इस गांव में कोई नहीं पीता शराब
झारखंड के इस गांव में कोई नहीं पीता शराब

दिलीप कुमार, जमशेदपुर। झारखंड में राज्य सरकार जहां खुद शराब बेच रही है, वहीं एक आदिवासी बहुल गांव यहां ऐसा भी है, जहां गत 25 वर्षो से खुद ग्रामीणों ने शराबबंदी लागू कर रखी है। गांव का नाम है देवघर।

जमशेदपुर से 10 किलोमीटर दूर इस गांव में संथाल, भूमिज व मुंडा आदिवासियों की बहुलता है। नशे से दूर इस गांव के युवा अब शिक्षा और रोजगार हासिल कर रहे हैं।

ऐसे हुआ नशामुक्त:

पहले यहां हर कोई शराब पीता था। शराब का चलन जमकर था। नशा, झगड़ा और अपराध के कारण कई लोग मारे गए। तब कुछ स्थानीय सामाजिक संगठनों ने ग्रामीणों को नशामुक्ति के लिए जागरूक किया। अपने परिजनों को खो चुके ग्रामीणों, खास तौर पर महिलाओं ने इस बात को समझा और गांठ बांध लिया। लेकिन कुछ लोग तब भी नहीं माने।

गांव के ही वृधान सोरेन बताते हैं कि ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार किया जाने लगा। धीरे-धीरे लोगों को समझ में आ गया कि शराब जानलेवा है। और एक दिन ऐसा आया कि गांव के सभी लोगों ने बैठक की और गांव में शराब बेचने व पीने पर ही प्रतिबंध लगा दिया। 25 साल से यह प्रतिबंध लागू है। कोई इसका उल्लंघन नहीं करता।

1992 से नहीं बिक रही शराब:

ग्राम प्रधान सिमल मुर्मू बताते हैं कि गांव वालों ने 1992 में शराब पर प्रतिबंध लगाया था। गांव में शराब बेचने वालों को धंधा बंद करने की चेतावनी दी गई। तब से गांव में शराबबंदी बदस्तूर जारी है। पहले गांव में जगह-जगह शराब बिकती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब तो कोई बाहर से खरीदकर भी नहीं लाता।

पहले शराब का विरोध करने वाली महिलाओं और अन्य लोगों की पिटाई कर दी जाती थी। लेकिन वे डटे रहे। शराबबंदी के बाद यहां बहुत बदलाव आया है। नौकरी करने वालों की संख्या बढ़ने लगी है। बच्चे स्कूल जाने लगे हैं। गांव के युवा आर्मी, पुलिस और शहरों में भी नौकरी कर रहे हैं।

रस्म अदायगी तक सिमटी शराब:

आदिवासी समाज में शराब का प्रयोग पूजा-पाठ, शादी-ब्याह में अनिवार्य रूप से होता आया है, लेकिन इस गांव में लोगों ने इसे महज रस्म अदायगी तक सीमित कर दिया है। गांव के ही दिलीप सोरेन कहते हैं कि परंपरा और आस्था के चलते शराब का इस्तेमाल पूजा-पाठ में होता है, लेकिन केवल रस्म अदायगी तक ही सीमित है।

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