जमशेदपुर, जासं। बुरे से बुरा व्यक्ति भी एकदम से बुरा नहीं होता, उसमें कुछ अच्छाई छिपी होती है और अच्छे से अच्छा व्यक्ति भी बहुत अच्छा नहीं होता, मनुष्य होने के नाते उसमें भी कुछ बुराई छिपी होती है। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है, प्रेमचंद ने अपनी कहानियों के जरिए इस मनोवैज्ञानिक सत्य को बड़े सरल और सहज ढंग से पाठकों के सामने लाया है।

शहर की साहित्यकार गीता दुबे बताती हैं कि प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही नामक ग्राम में हुआ था। जयंती पर प्रेमचंद को याद करते हुए कहती हैं कि शीर्षस्थ साहित्यकार कथा सम्राट प्रेमचंद गैर-हिंदी भाषियों के बीच भी उतने ही लोकप्रिय रहे हैं, जितने हिंदी भाषियों के बीच। प्रेमचंद उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक पढ़े जाते रहे हैं। हालांकि प्रेमचंद को सिर्फ किसी एक भाषा यानी हिंदी के दायरे तक सीमित नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्होने अपना शुरुआती लेखन उर्दू में किया था और काफी सालों तक वे उर्दू में ही लिखते रहे, छपते रहे। उनका पहला उर्दू उपन्यास ‘असरार-ए- मआबिद’ नवाब राय के नाम से लिखा गया था। प्रेमचंद की शुरुआती शिक्षा उर्दू-फारसी में ही हुई थी लेकिन प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य को जमीन पर पांव टिकाना सिखाया और कड़वी से कड़वी जमीनी सच्चाई से रूबरू कराया। प्रेमचंद का साहित्य हमारे जीवन से जुड़ा हुआ है। सीधे-सादे, सरल प्रकृति के इंसान प्रेमचंद ने जो देखा, जो महसूस किया उसे सहज, सरल तरीके से पाठकों के सामने रखा। हम दर्शन लिखते रहे हैं, धर्म और राजनीति की व्याख्या करते रहे हैं, बड़ी–बड़ी लच्छेदार बातें लिखते रहे हैं, लेकिन यदि ऐसा साहित्य आम आदमी की समझ में न आए तो लिखना निरर्थक होता है। प्रेमचंद ने बड़े ही सरल, स्वाभाविक ढंग से पात्रों के माध्यम से अपनी बातें रखीं हैं, जो सीधे-सीधे हमारे दिल में उतर जाती है, हमारा उनका दिल से रिश्ता बन जाता है। प्रेमचंद के पात्र जब दुखी होते हैं तो हम भी दुखी हो जाते हैं और जब वे हंसते हैं तो हम भी उनके साथ खुश हो जाते हैं। इनके अच्छे पात्र हमारी अच्छाइयों को बढ़ाते हैं और बुरे पात्र हमारी बुराइयों को घटाते हैं। प्रेमचंद के शब्दों में ‘मैं चाहता हूं कि मेरी कहानियों के पात्र आपको यह महसूस कराए कि ये पात्र आप हैं, कहानी आपके परिवार की है, आपके पड़ोस की है, तब मैं समझता हूं कि मेरी कहानी सफल हुई। एक बड़े साहित्यकार की यही पहचान है। प्रेमचंद साहित्य कल, आज और कल हमेशा प्रासंगिक रहेगी, चाहे कोई भी सदी रहे, कोई भी समय रहे प्रेमचंद हमेशा पढ़े जाएंगे, सराहे जाएंगे। मानव चेतना शाश्वत है, जब तक समाज रहेगा अमीर और गरीब रहेंगे, ईदगाह का हामिद रहेगा, ईमानदार और बेईमान रहेंगे, ‘नमक का दारोगा’ के ईमानदार वंशीधर अब भी मिल जाएंगे, बेमेल विवाह का दर्द झेल रही ‘निर्मला’ आज भी मौजूद है। खाना को तरसती ‘बूढ़ी काकी’ आज घर-घर में मिल जाएंगी और ‘पंच-परमेश्वर’ के जुम्मन शेख और अलगू चौधरी भी आज हमारे समाज का हिस्सा बने हुए हैं। ये सभी पात्र हरेक युग में हमेशा जीवित रहेंगे, ये पात्र हमारी चेतना हैं।

प्रेमचंद भी गए थे मुंबई, बैरंग लौटे

आर्थिक संकट से जूझ रहे प्रेमचंद ने फिल्म उद्योग में भी अपना भाग्य आजमाया, लेकिन वहां उन्हें निराशा ही हाथ लगी। जैनेंद्र को लिखे एक पत्र में उन्होने इसका जिक्र किया है। वे लिखते हैं कि “एक को बंबई आ गया.. यहां दुनिया दूसरी है..यहां की कसौटी दूसरी है.. साल भर किसी तरह काटूंगा, आगे देखी जाएगी। मैं जिन इरादों से आया था, उनमें एक भी पूरे होते नजर नहीं आते.. वल्गैरिटी को ये लोग एंटरटेनमेंट वैल्यू कहते हैं..। मैंने सामाजिक कहानियां लिखी हैं, जिन्हें शिक्षित समाज भी देखना चाहे..” स्पष्ट है कि प्रेमचंद मुंबई अपने तय इरादों से गए थे और जब वे पूरे नहीं हुए तो वे वापस लौट आए। क्या भारतीय सिनेमा जगत आज भी समाज में वल्गैरिटी नहीं परोस रही। क्या आज की फिल्में परिवार के साथ देखी जा सकती है। अब भी मनोरंजन के नाम पर सिनेमा जगत अश्लीलता ही परोस रहे हैं। मुंशी प्रेमचंद जी ने लगभग 300 से अधिक कहनियां, डेढ़ दर्जन उपन्यास, हजारों पन्नों के लेख, संपादकीय, भाषण, पत्र लिखे हैं, उपन्यासों में उनकी गहन पकड़ के चलते 1918 से 1936 के कालखंड को ‘प्रेमचंद युग’ कहा जाता है और उन्हें ‘उपन्यास सम्राट’ लेकिन उनके समय और आज के समाज की समानताएं देखी जाएं, तो लगता है कि प्रेमचंद युग अभी समाप्त ही नहीं हुआ है।

Edited By: Rakesh Ranjan