जमशेदपुर ( दिलीप कुमार) । अयोध्या पर्वत शृंखला की चोटी पर कृतिवास आश्रम में माता सीता की लकड़ी से बनी प्रतिमा है, जिसे लोग आदि माता के नाम से पुकारते हैं। यहां पूरी तरह से लकड़ी से बना मंदिर भी है। मंदिर और प्रतिमा गम्हार की लकड़ी से बना है। कृतिवास बाबा के निधन के बाद आश्रम की जिम्मेदारी शंभू महतो के पास है। इसी आश्रम में है शिवलिंग, जहां आदि काल से पूजा-अर्चन हो रहा है।

मिट्टी के मकान के अंदर स्थित शिवलिंग वाले कमरे में कई गड्ढे हैं, जहां रोज सांप निकलते हैं और उनके लिए रखे गए भोजन खाकर वापस अपने बिल में घुस जाते हैं। छोटे से पत्थर के शिवलिंग पर कब से पूजा हो रही है इस पर बड़े-बुजुर्गों ने भी अनभिज्ञता जाहिर करते हैं। उसके सामने वाले कमरे में मां दुर्गा, शिव, काली, अनंत शक्ति, नरसिंह, नाग, बाघ, क्रुश, वृद्ध स्थापित है। इस मंदिर की स्थापना 1979 में हुई है। यहां मां दुर्गा के हाथ में रखा दीया बीते 41 वर्षों से लगातार जल रहा है। मंदिर के संचालक शंभू महतो बताते हैं कि रोज दीये में घी डालना पड़ता है।

 

सीताकुंड से लगातार बह रही जलधारा

अयोध्या पर्वत श्रृंखला में स्थित सीताकुंड में लगातार जलधारा निकलती है। कहते हैं माता सीता की प्यास मिटाने के लिए प्रभु श्रीराम ने अपनी वाण से भूगर्भ से जलधारा निकनी थी। इस क्षेत्र को स्थानीय लोग गढ़धाम कहते हैं। गढ़धाम में प्राचीन परंपरा के अनुसार रोज पुजारी जामिनी लाया द्वारा पूजा किया जाता है। कहते हैं कि सीताकुंड में स्नान करने के बाद ही कृतिवास आश्रम में शिवलिंग और मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करने की परंपरा रही है। ऐसा करने से श्रद्धालुओं की मनोकामना भी पूरी होती है। पर्वत चोटी पर हनुमानजी की प्राचीन मंदिर स्थित है।

पवित्र स्थल माना जाता है अयोध्या पर्वत शृंखला

वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के अयोध्या पर्वत शृंखला में आने के कई निशानियां मौजूद हैं। अयोध्या पर्वत को पश्चिम बंगाल व झारखंड में पवित्र स्थल के रूप में माना जाता है। पूरे साल कोलकाता, वर्दमान, बीरभूम, बांकुड़ा, दुर्गापुर, आसनसोल, झारग्राम, रांची, धनबाद, बोकारो, जमशेदपुर समेत देश के अन्य क्षेत्रों से श्रद्धालु व पर्यटक आते हैं। जनश्रुति के अनुसार, वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम ने सीता व अनुज लक्ष्मण के साथ यहां ढाई दिन बिताए थे।

वनवास के दौरान माता सीता को प्यास लगी थी और उन्होंने प्रभु से पानी की मांग की थी। उस समय माता सीता की प्यास बुझाने के लिए राम ने वाण चलाकर अयोध्या पहाड़ की चोटी पर जल धारा निकाली थी। जिसे क्षेत्र के लोग सीताकुंड कहते हैं। अयोध्या पर्वत शृंखला में माता के पैरों के निशान और पेड़ पर लहराते बाल भी उनके आने के प्रमाण हैं। बड़े-बुजुर्ग बताते है कि माता के पदचिन्ह अब बड़े-बड़े चट्टानों से ढंक गए हैं। वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के अयोध्या पर्वत शृंखला में आने की कई निशानियां मौजूद हैं।

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