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बाघ की गर्जना से जुड़ी है परंपरा: अमावस्या नहीं, बल्कि कार्तिक पूर्णिमा पर नीमडीह के इन गांवों में मनाया जाता है बांदना पर्व

By Dilip KumarEdited By: Sanjeev Kumar
Published: Wed, 04 Nov 2026 08:15 PM (IST)

झारखंड के नीमडीह प्रखंड के लाकड़ी और बागड़ी गांवों में बांदना पर्व कार्तिक पूर्णिमा पर मनाया जाता है, जो अन्य स्थानों से अलग है।

सरायकेला-खरसावां: नीमडीह प्रखंड के लाकड़ी और बागड़ी गांवों में अमावस्या की बजाय कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर बांदना पर्व मनाने की अनूठी परंपरा है, जो बाघ की गर्जना से जुड़ी लोककथा और ग्रामीणों की गहरी आस्था का प्रतीक है।

सरायकेला-खरसावां: नीमडीह प्रखंड के लाकड़ी और बागड़ी गांवों में अमावस्या की बजाय कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर बांदना पर्व मनाने की अनूठी परंपरा है, जो बाघ की गर्जना से जुड़ी लोककथा और ग्रामीणों की गहरी आस्था का प्रतीक है।

HighLights

  1. बांदना पर्व कार्तिक पूर्णिमा पर, अमावस्या के बजाय।

  2. बाघ की गर्जना से जुड़ी है यह अनोखी परंपरा।

  3. लाकड़ी-बागड़ी गांवों की सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान।

जासं, दिलीप कुमार। झारखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति में बांदना पर्व का विशेष स्थान है। यह पर्व आमतौर पर अधिकांश स्थानों पर काली पूजा के आसपास अमावस्या के अवसर पर मनाया जाता है। 
 
लेकिन सरायकेला-खरसावां जिले के नीमडीह प्रखंड अंतर्गत लाकड़ी और बागड़ी गांवों की परंपरा इससे बिल्कुल अलग है। यहां बांदना पर्व अमावस्या की बजाय कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर मनाने की अनोखी परंपरा है। 
 
इसके पीछे बाघ की गर्जना से जुड़ी एक रोचक लोककथा और ग्रामीणों की गहरी अटूट आस्था जुड़ी हुई है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी दोनों गांवों की अनूठी सांस्कृतिक पहचान को सहेजे हुए है।
 

बाघ की गर्जना से जुड़ी है लोककथा 

लाकड़ी गांव के ग्राम प्रधान रंजीत माझी के अनुसार, वर्षों पहले बांदना पर्व के दौरान गांव के गोहाल यानी मवेशियों को रखने के स्थान से एक बाघ मवेशी को उठाकर ले गया था। 
 
इस अचानक हुई घटना से पूरे गांव में शोक छा गया था। ग्रामीणों ने इसे प्रकृति और दैवीय इच्छा मानकर उस वर्ष बांदना पर्व नहीं मनाया।
 
इसके बाद ग्रामीणों की एक सामूहिक बैठक हुई, जिसमें विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया कि अब गांव के समीप स्थित पहाड़ से बाघ की गर्जना सुनाई देने के बाद ही बांदना पर्व मनाया जाएगा। 
 
तभी से बाघ की दहाड़ इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है। ग्रामीणों का पूर्ण विश्वास है कि बाघ की गर्जना सुनने के बाद ही पर्व मनाने का सही समय आता है। 
 

तीन दिनों तक चलते हैं पारंपरिक अनुष्ठान 

इसी मान्यता के चलते यहां बांदना का आयोजन अन्य स्थानों की तुलना में कुछ विलंब से होता है। दोनों गांवों में बांदना पर्व तय रीति-रिवाजों और निर्धारित दिनों के अनुसार मनाया जाता है: 
  • बुधवार: इस दिन पारंपरिक रूप से गोट पूजा की जाती है।
  • गुरुवार: इसके अगले दिन मवेशियों के आश्रय स्थल यानी गोहाल में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
  • शुक्रवार: इस दिन पारंपरिक गोरू खुटान की मुख्य रस्म निभाई जाती है।
 
ग्रामीणों के अनुसार, खुटान की यह परंपरा पूर्णिमा के दिन या उससे एक-दो दिन पूर्व पूरी कर ली जाती है, जिससे इस पूरे पर्व का आयोजन कार्तिक पूर्णिमा के आसपास संपन्न होता है।
 

वन्यजीवों से जुड़े हैं गांवों के नाम 

लाकड़ी और बागड़ी गांवों के नामकरण के पीछे भी दिलचस्प लोककथाएं जुड़ी हैं। बुजुर्गों की मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में यह पूरा क्षेत्र घने जंगलों से घिरा हुआ था। 
 
जंगल के एक हिस्से में जहां बाघों का बसेरा हुआ करता था, वहीं दूसरे हिस्से में लकड़बग्घे विचरण किया करते थे। इन्हीं वन्यजीवों और ऐतिहासिक परिवेश से जोड़कर दोनों गांवों के नाम की उत्पत्ति की कहानियां सुनाई जाती हैं।
 

प्रकृति और पशुधन के प्रति सम्मान का प्रतीक 

बांदना झारखंड की कृषि आधारित लोकपरंपराओं का बेहद महत्वपूर्ण पर्व है। इसमें मवेशियों और पशुधन के प्रति सम्मान, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और बेहतर कृषि की कामना का भाव मुख्य रूप से निहित होता है। 
 
खेती-किसानी पर निर्भर परिवारों के लिए पशुधन आज भी उनके आर्थिक और सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग हैं।
 
समय के साथ आधुनिक जीवनशैली में भले ही बदलाव आया हो, लेकिन लाकड़ी और बागड़ी गांवों के ग्रामीणों ने अपनी प्राचीन मान्यताओं और सांस्कृतिक धरोहर को पूरी शिद्दत से सहेजकर रखा है। 
 
यहां बांदना पर्व पूर्वजों की स्मृतियों, जंगलों से जुड़ाव और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की एक ऐसी जीवंत दास्तान है, जो इस क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत को रोशन कर रही है।

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