झारखंड से राज्यसभा में फिर ‘थैलीशाह’ कर रहे कांग्रेस से टिकट के लिए तगड़ी लाबिंग; चुनाव हार चुके नेताओं की बढ़ी सक्रियता
झारखंड में राज्यसभा की एक सीट के लिए कांग्रेस के भीतर टिकट पाने के लिए 'थैलीशाह' नेताओं की लॉबिंग तेज ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।
HighLights
झारखंड राज्यसभा सीट के लिए कांग्रेस में लॉबिंग तेज।
'थैलीशाह' नेता टिकट पाने के लिए सक्रिय, कार्यकर्ताओं में असंतोष।
पार्टी नेतृत्व के सामने निष्ठा बनाम व्यावहारिकता की चुनौती।
जासं, जमशेदपुर। झारखंड से राज्यसभा की एक सीट के लिए होने वाले आगामी चुनाव को लेकर कांग्रेस के भीतर अंदरूनी राजनीतिक हलचल चरम पर पहुंच गई है। पार्टी के अंदरखाने टिकट पाने के लिए पैरवी और लाबिंग का दौर बेहद तेज हो चुका है।
इस रेस में सबसे आगे वे 'थैलीशाह' यानी आर्थिक रूप से बेहद संपन्न नेता नजर आ रहे हैं, जो पिछले कुछ वर्षों में चुनावी शिकस्त झेल चुके हैं और अब राज्यसभा के रास्ते सक्रिय राजनीति के मुख्य पटल पर वापसी की जुगत में लगे हैं।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा बहुत तेजी से फैल रही है कि पार्टी नेतृत्व एक बार फिर संगठनात्मक संघर्ष करने वाले चेहरों के बजाय आर्थिक रूप से मजबूत और भारी-भरकम संसाधनों वाले उम्मीदवारों पर दांव लगाने की तैयारी में है।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा बहुत तेजी से फैल रही है कि पार्टी नेतृत्व एक बार फिर संगठनात्मक संघर्ष करने वाले चेहरों के बजाय आर्थिक रूप से मजबूत और भारी-भरकम संसाधनों वाले उम्मीदवारों पर दांव लगाने की तैयारी में है।
राज्यसभा टिकट की इस दौड़ में ऐसे कद्दावर नेता भी शामिल बताए जा रहे हैं, जो पूर्व में राज्य सरकार के भीतर महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।
विधानसभा चुनाव में करारी पराजय का सामना करने के बाद से इन नेताओं की जमीनी राजनीतिक सक्रियता काफी सीमित हो गई थी। हालांकि, हाल के दिनों में उनके परिवार के सदस्यों की राजनीतिक मंचों पर बढ़ती आवाजाही के बाद उनका मनोबल फिर से बढ़ गया है।
ये दावेदार न केवल प्रादेशिक संगठन बल्कि केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर भी अपने लिए हर संभव समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। इतना ही नहीं, कांग्रेस कोटे की इस सीट पर मजबूत पकड़ बनाने के लिए ये नेता गठबंधन के प्रमुख घटक दल 'झारखंड मुक्ति मोर्चा' (झामुमो) के शीर्ष नेतृत्व को भी अपने पक्ष में करने का भरसक प्रयास कर रहे हैं, ताकि चुनाव के वक्त किसी भी प्रकार के अंतर्द्वंद्व से बचा जा सके।
ये दावेदार न केवल प्रादेशिक संगठन बल्कि केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर भी अपने लिए हर संभव समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। इतना ही नहीं, कांग्रेस कोटे की इस सीट पर मजबूत पकड़ बनाने के लिए ये नेता गठबंधन के प्रमुख घटक दल 'झारखंड मुक्ति मोर्चा' (झामुमो) के शीर्ष नेतृत्व को भी अपने पक्ष में करने का भरसक प्रयास कर रहे हैं, ताकि चुनाव के वक्त किसी भी प्रकार के अंतर्द्वंद्व से बचा जा सके।
धनबल वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने का पुराना इतिहास
यदि अतीत के पन्नों को पलटें तो झारखंड में राज्यसभा चुनावों के दौरान आर्थिक रूप से सक्षम उम्मीदवारों को तरजीह देने का कांग्रेस का एक लंबा इतिहास रहा है। पार्टी ने कई मौकों पर ऐसे चेहरों को चुनावी मैदान में आगे किया है।
जिनकी पहचान जमीनी स्तर पर संगठनात्मक संघर्ष या जनआंदोलनों से अधिक उनके विशाल संसाधनों, उद्योगों और आर्थिक प्रभाव के कारण रही है। राज्यसभा चुनाव के जटिल अंकगणित, विधायकों की प्राथमिकता वाले वोट और चुनावी प्रबंधन की असाधारण जरूरतों को देखते हुए अक्सर ऐसे धनाढ्य उम्मीदवारों को आंतरिक स्तर पर बढ़त मिल जाती है।
इसी संदर्भ में राजनीतिक हलकों में पूर्व राज्यसभा सदस्य एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता धीरज प्रसाद साहू के नाम की भी चर्चाएं तेज हैं। लंबे समय तक झारखंड कांग्रेस का एक बड़ा और वित्तीय रूप से भरोसेमंद चेहरा रहे साहू को लेकर इस बार पार्टी आलाकमान बेहद सतर्क और चौकन्ना नजर आ रहा है।
इसी संदर्भ में राजनीतिक हलकों में पूर्व राज्यसभा सदस्य एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता धीरज प्रसाद साहू के नाम की भी चर्चाएं तेज हैं। लंबे समय तक झारखंड कांग्रेस का एक बड़ा और वित्तीय रूप से भरोसेमंद चेहरा रहे साहू को लेकर इस बार पार्टी आलाकमान बेहद सतर्क और चौकन्ना नजर आ रहा है।
पिछले दिनों उनके विभिन्न ठिकानों पर आयकर विभाग द्वारा की गई मैराथन छापेमारी में भारी मात्रा में बेहिसाबी नकदी बरामद हुई थी, जिसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को विपक्षी दलों के तीखे हमलों और भारी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। सूत्रों का कहना है कि इसी छवि को सुधारने के लिए फिलहाल उन्हें सार्वजनिक मंचों और चुनावी चर्चाओं से दूर रहने की सख्त हिदायत दी गई है।
जमीनी कार्यकर्ताओं में पनप रहा है भारी असंतोष
राज्यसभा टिकट के लिए चल रही इस भारी लाबिंग और 'धनबल' के खेल के बीच कांग्रेस के मूल और निष्ठावान जमीनी कार्यकर्ताओं में गहरी बेचैनी और असंतोष पनपने लगा है।
संगठन के भीतर अब यह यक्ष प्रश्न उठने लगा है कि यदि देश के इस सर्वोच्च सदन में भेजने का एकमात्र मापदंड केवल आर्थिक क्षमता, अकूत संपत्ति और संसाधन ही बनते हैं, तो फिर जो कार्यकर्ता वर्षों से धूप, बरसात और कड़ाके की ठंड में पार्टी का झंडा उठाकर संघर्ष कर रहे हैं, उनके लिए नेतृत्व के पदों पर आने का अवसर कहां बचेगा?
पार्टी के कई समर्पित नेताओं और कार्यकर्ताओं का स्पष्ट मानना है कि राज्यसभा जैसे गरिमामयी और महत्वपूर्ण विधायी मंच पर केवल ऐसे चेहरों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जिन्होंने संगठन को सींचने और विपरीत परिस्थितियों में उसे मजबूत बनाए रखने में अपना पूरा जीवन खपा दिया हो।
पार्टी के कई समर्पित नेताओं और कार्यकर्ताओं का स्पष्ट मानना है कि राज्यसभा जैसे गरिमामयी और महत्वपूर्ण विधायी मंच पर केवल ऐसे चेहरों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जिन्होंने संगठन को सींचने और विपरीत परिस्थितियों में उसे मजबूत बनाए रखने में अपना पूरा जीवन खपा दिया हो।
उनका तर्क है कि यदि बार-बार जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर केवल धनबल वाले चेहरों को ही उच्च सदन का टिकट थमाया जाएगा, तो इससे पार्टी के लिए खून-पसीना बहाने वाले कार्यकर्ताओं का मनोबल पूरी तरह टूट जाएगा।
नेतृत्व के सामने निष्ठा बनाम व्यावहारिकता की बड़ी चुनौती
आगामी राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस के केंद्रीय और प्रादेशिक नेतृत्व के सामने इस समय सबसे बड़ी परीक्षा संगठनात्मक निष्ठा और चुनावी व्यावहारिकता (मैनेजमेंट) के बीच एक बारीक संतुलन स्थापित करने की है।
एक तरफ पार्टी को संसद में एक ऐसा प्रखर और बौद्धिक उम्मीदवार चाहिए जो राज्य के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठा सके और विधायी प्रक्रियाओं में परिपक्व भूमिका निभा सके।
वहीं दूसरी तरफ उसे अपने उन हजारों कार्यकर्ताओं की भावनाओं और संगठनात्मक शुचिता के संदेश का भी पूरा ध्यान रखना होगा जो पार्टी की रीढ़ हैं।
आने वाले दिनों में ही यह पूरी तरह साफ हो पाएगा कि कांग्रेस आलाकमान झारखंड से राज्यसभा के इस महत्वपूर्ण रण में किस चेहरे पर अंतिम भरोसा जताता है, लेकिन फिलहाल टिकट वितरण को लेकर चल रही अंदरूनी खींचतान और अटकलों का बाजार पूरी तरह गर्म है।
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