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BARC की रिपोर्ट से सच आया सामने: जादुगोड़ा की मिट्टी, पानी और खदानें पूरी तरह सुरक्षित; कैंसर से रेडिएशन का संबंध नहीं

Published: Tue, 06 Oct 2026 07:00 AM (IST)

यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (UCIL) और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) ने जादुगोड़ा में विकिरण को लेकर फैलाए जा रहे भ्रम को खारिज किया है।

जादुगोड़ा का विकिरण स्तर देश-दुनिया के कई सामान्य क्षेत्रों और केरल के समुद्री तटों से भी करीब छह गुना कम है।

जादुगोड़ा का विकिरण स्तर देश-दुनिया के कई सामान्य क्षेत्रों और केरल के समुद्री तटों से भी करीब छह गुना कम है।

HighLights

  1. जादुगोड़ा में विकिरण स्तर वैश्विक औसत से काफी कम पाया गया।

  2. पानी, मिट्टी और टेलिंग्स पॉन्ड पूरी तरह सुरक्षित घोषित किए गए।

जासं, जमशेदपुर। जादुगोड़ा यूरेनियम खनन क्षेत्र में विकिरण (रेडिएशन) को लेकर फैलाए जा रहे भ्रम को यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (UCIL) और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) ने वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर पूरी तरह खारिज कर दिया है। 
 
यूसील के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (CMD) काचम आनंद राव ने सोमवार को बताया कि पिछले छह दशकों के खनन का स्थानीय पर्यावरण पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। 
 
जादुगोड़ा का विकिरण स्तर देश-दुनिया के कई सामान्य क्षेत्रों और केरल के समुद्री तटों से भी करीब छह गुना कम है।
 

वैश्विक औसत से भी नीचे है जादुगोड़ा का रेडिएशन स्तर 

बीएआरसी (BARC) के हेल्थ फिजिक्स यूनिट के प्रभारी एनके सेठी द्वारा पेश तकनीकी रिपोर्ट के अनुसार, जादुगोड़ा क्षेत्र में प्राकृतिक पृष्ठभूमि विकिरण (नेचुरल बैकग्राउंड रेडिएशन) मात्र 2.6 मिलीसीवर्ट प्रति वर्ष है, जबकि इसका वैश्विक औसत 3.0 है। 
 
वहीं, केरल के तटीय इलाकों (मोनाजाइट रेत) में यह 15.7 मिलीसीवर्ट प्रति वर्ष तक दर्ज किया जाता है, जो पूरी तरह सुरक्षित है। 
 
सीएमडी आनंद राव ने बताया कि टाटा मेमोरियल सेंटर और टिस (TISS) सहित 10 से अधिक शीर्ष संस्थानों के अध्ययनों ने साबित किया है कि स्थानीय बीमारियों या कैंसर का खनन व रेडिएशन से कोई संबंध नहीं है। 
 
जादुगोड़ा की खदानों में अयस्क का ग्रेड 0.05 प्रतिशत से भी कम है, जिसे आईएईए (IAEA) के मानकों में बेहद सुरक्षित श्रेणी में रखा गया है।
 

पानी, मिट्टी और टेलिंग्स पॉन्ड पूरी तरह सुरक्षित 

बीएआरसी की स्वतंत्र निगरानी में यह तथ्य सामने आया कि जादुगोड़ा, नरवापहाड़ और तुरामडीह के भूजल में यूरेनियम की मात्रा निर्धारित पेयजल मानक (60 मिलीग्राम प्रति घन मीटर) की तुलना में नगण्य है। 
 
टेलिंग्स पॉन्ड (अपशिष्ट तालाब) के आसपास की मिट्टी और भूजल में किसी भी रेडियोधर्मी तत्व का रिसाव नहीं मिला है। खदान कर्मियों को मिलने वाला रेडिएशन भी नियामक संस्था एईआरबी (AERB) की 20 मिलीसीवर्ट की सुरक्षित सीमा से बेहद कम है। 
 
कंपनी स्थानीय लोगों के मन से डर दूर करने के लिए विशेषज्ञों के साथ जन-जागरूकता अभियान चला रही है। भारत की सामरिक संप्रभुता और परमाणु ऊर्जा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्वदेशी यूरेनियम का कोई विकल्प नहीं है।
 

फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों में केवल स्वदेशी यूरेनियम का होगा उपयोग 

अंतरराष्ट्रीय निगरानी और समझौतों की बंदिशों के कारण देश अपने दूसरे चरण के फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों में विदेशी यूरेनियम का इस्तेमाल नहीं कर सकता। 
 
सीएमडी आनंद राव ने पत्रकारों से दो टूक कहा कि कलपक्कम में शुरू हुए प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) के साथ दूसरे चरण की यात्रा आरंभ हो चुकी है। 
 
इस चरण और इसके बाद के रिएक्टरों में जाने वाला एक-एक ग्राम यूरेनियम केवल यूसीआईएल द्वारा उत्पादित होगा। जब तक भारत थोरियम से ऊर्जा बनाने की पूर्ण आत्मनिर्भरता हासिल नहीं कर लेता, तब तक घरेलू खदानों का यूरेनियम ही देश को सुरक्षा कवच देगा।
 

सामरिक कारणों से उत्पादन के आंकड़े सार्वजनिक नहीं 

आनंद राव ने बताया कि परमाणु ऊर्जा अधिनियम-1962 के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण यूरेनियम उत्पादन के वास्तविक आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया जाता। 
 
वर्तमान में यूसीआईएल घरेलू जरूरतों का लगभग 30 से 40 प्रतिशत ईंधन उपलब्ध करा रहा है। आगामी वर्षों में पूर्ण आत्मनिर्भरता के लिए झारखंड और आंध्र प्रदेश की मौजूदा खदानों के विस्तार के साथ-साथ राजस्थान के रोहिल और कर्नाटक में नए ग्रीनफील्ड खनन प्रोजेक्ट्स पर तेज गति से काम चल रहा है।