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Uranium mining: चट्टानों को तोड़कर कैसे बनता है परमाणु ईंधन? जानिए नरवा पहाड़ खदान का पूरा सच

Published: Mon, 05 Oct 2026 08:41 PM (IST)

जमशेदपुर की नरवापहाड़ खदान में 315 मीटर गहराई से अत्याधुनिक तकनीक से यूरेनियम का खनन हो रहा है। यह स्वदेशी ...और पढ़ें

रवापहाड़ स्थित भूमिगत खदान के आठवें लेवल में अत्याधुनिक ट्रैकलेस तकनीक से परमाणु अयस्क का खनन किया जा रहा है।

रवापहाड़ स्थित भूमिगत खदान के आठवें लेवल में अत्याधुनिक ट्रैकलेस तकनीक से परमाणु अयस्क का खनन किया जा रहा है।

HighLights

  1. नरवापहाड़ खदान में 315 मीटर गहराई से यूरेनियम खनन।

  2. रेडियोमेट्रिक पहचान, जंबो ड्रिलिंग से अयस्क का निष्कर्षण।

  3. एसिड लीचिंग से 'यलो केक' बनाकर परमाणु ईंधन निर्माण।

जासं, जमशेदपुर। जमीन से लगभग 315 मीटर की गहराई पर, जहां घने अंधेरे के बीच चट्टानों का सीना चीरती भारी-भरकम मशीनों की गूंज सुनाई देती है, वहां देश की आणविक आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव रखी जा रही है। 
 
यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (UCIL) की नरवापहाड़ स्थित भूमिगत खदान के आठवें लेवल (तल्ले) में अत्याधुनिक ट्रैकलेस तकनीक से परमाणु अयस्क का सुरक्षित दोहन किया जा रहा है। 
 
UCIL के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (CMD) काचम आनंद राव ने बताया कि स्वदेशी यूरेनियम का सुरक्षित उत्खनन और रासायनिक शोधन भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की जीवनरेखा है।
 

रेडियोमेट्रिक पहचान, ग्रिड लाइनिंग और जंबो ड्रिलिंग 

भूमिगत खदान से अयस्क निकालने की शुरुआत वैज्ञानिक परीक्षणों से होती है। भू-वैज्ञानिक रेडियोमेट्रिक उपकरणों (सिंटिलोमीटर) के माध्यम से चट्टानों में यूरेनियम की मौजूदगी को मापते हैं। 
 
इसके बाद पीले रंगों से चट्टान की दीवारों पर अयस्क (Ore) और बंजर पत्थर (Waste) की स्पष्ट सीमाएं तय की जाती हैं। ग्रिड लाइनिंग के तुरंत बाद दोहरी भुजाओं वाली विशाल इलेक्ट्रो-हाइड्रोलिक जंबो ड्रिलर मशीन आगे बढ़ती है और चंद मिनटों में सख्त चट्टानों में तय कोण पर गहरे सुराख कर देती है।
 

नियंत्रित ब्लास्टिंग और डंपरों से ढुलाई 

ड्रिल किए गए सुराखों में विशेष विस्फोटक भरकर कंट्रोल्ड ब्लास्टिंग की जाती है, ताकि मुख्य संरचना को नुकसान पहुंचे बिना केवल यूरेनियम युक्त चट्टानें ही टूटें। 
 
विस्फोट के बाद मलबे को शक्तिशाली लोड-हॉल-डंपर (LHD) मशीनें उठाकर लो-प्रोफाइल डंपरों में लोड करती हैं। ये डंपर घुमावदार रैंप और डिक्लाइन मार्ग से होकर अयस्क को सतह तक पहुंचाते हैं।
 

एसिड लीचिंग और 'यलो केक' का निर्माण 

सतह पर पहुंचा अयस्क सीधे प्रोसेसिंग मिल में जाता है। वहां क्रशर में पत्थरों को पीसकर बारीक पाउडर का घोल बनाया जाता है। 
 
इसके बाद 'एसिड लीचिंग' प्रक्रिया के तहत सल्फ्यूरिक एसिड मिलाकर यूरेनियम को तरल में घोला जाता है। ड्रम फिल्टरों से ठोस कचरे को अलग करने के बाद मैग्नीशिया मिलाकर यूरेनियम को अवक्षेपित (Precipitate) किया जाता है।
 
सुखाने के बाद यह चमकीले पीले पाउडर यानी यलो केक (मैग्नीशियम डाइयूरेनेट) में बदल जाता है। अंत में इसे सीलबंद स्टील ड्रमों में भरकर ईंधन छड़ें (Fuel Rods) तैयार करने के लिए एनएफसी (NFC) हैदराबाद भेज दिया जाता है।