जमशेदपुर, जासं। भारत जैसे-जैसे आधुनिकीकरण की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे भारतीयों पर पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। पूर्व में स्कूलों और कॉलेजों में हल्दी-कुमकुम की रस्में मनाई जाती थीं। समाज और राष्ट्र के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले समाज सुधारकों और क्रांतिकारियों की जयंती और वर्षगांठ मनाई जा रही थी, लेकिन इस समय वैलेंटाइन डे, रोज डे, रिबन डे, साड़ी डे और फ्रेंडशिप डे हर जगह मनाया जा रहा है।

कॉलेज की छात्राएं 'जीन्स' और 'टीशर्ट' में महाविद्यालय में विद्यार्जन करती नजर आ रही हैं। 'मिडी-मिनी' पोशाक में लड़कियां, जो पहले की फिल्मों में शायद ही कभी देखी जाती थीं, आज हर महाविद्यालय परिसर में घूमती नजर आती हैं। पाश्चात्य संस्कृति के व्यवहार के कारण आज की युवा पीढ़ी का नुकसान हो रहा है। इस प्रथा के कारण हमारी मूल हिंदू संस्कृति लुप्त होती जा रही है। मनोरंजन के रूप में या शौक के रूप में हम 31 दिसंबर की रात को नए वर्ष की पूर्व संध्या के लिए तैयारी करने लगते हैं और मध्यरात्रि उत्सव में स्वागत करते हैं, लेकिन ऐसा करना हमारी संस्कृति में नहीं है। भारतीय संस्कृति के अनुसार नया वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाना चाहिए, जो इस बार 2 अप्रैल को पड़ रहा है। महाराष्ट्र में इसे गुड़ीपड़वा के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को नए वर्ष के रूप में मनाएं और आनंद लें।

भारतीय संस्कृति का महत्व

हिंदू जनजागृति समिति के पूर्वी भारत प्रभारी शंभू गवारे बताते हैं कि भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन और महान संस्कृति है। मनुष्य को जन्म से मृत्यु तक कैसे व्यवहार करना चाहिए? अपने जन्म को कैसे सार्थक बनाएं? यह हमारे ऋषियों ने वेद उपनिषदों में लिखा है। इसका पालन करके आज कई लोगों ने अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है। आज पाश्चात्य लोग भी भारतीय संस्कृति की ओर आकर्षित हो रहे हैं। वे भारतीय शास्त्रों में शाश्वत आनंद को ढूंढ रहे हैं क्योंकि वे भोगवादी संस्कृति से त्रस्त हैं। साधना करके अपना कल्याण कर रहे हैं।

1 जनवरी ईसाई नववर्ष की शुरुआत

1 जनवरी वास्तव में ईसाई नववर्ष की शुरुआत है। आज जब ईसाई राष्ट्र विश्व में बहुसंख्यक हैं और उन्होंने विश्व के अधिकांश देशों पर राज किया हैं, इसलिए उनकी संस्कृति का प्रभाव पूरी दुनिया में देखा जा सकता है। इससे यह भ्रांति पैदा हो गई है कि '1 जनवरी विश्व नव वर्ष है', लेकिन आज दुनिया के नक्शे पर ऐसे कई देश हैं, जिन्होंने इस पश्चिमी संस्कृति को नष्ट कर स्वराष्ट्र की संस्कृति को बचाया हैं। उनका नया वर्ष 1 जनवरी से शुरू नहीं होता है। भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन है। भारतीय संस्कृति के अनुसार नए वर्ष की शुरुआत चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा या पहले दिन से होती है। यह पृथ्वी के निर्माण का दिन है। इसलिए सभी भारतीयों को चाहिए कि नए वर्ष की शुरुआत दो अप्रैल या गुड़ी पड़वा से करें। लेकिन देश की आजादी के बाद भी कुछ विषय में हमने अंग्रेजों के पारतंत्र को नहीं छोड़ा है। यह उनमें से एक है। हमें इसे छोड़ना होगा।

भारतीय संस्कृति शाश्वत

शंभू गवारे बताते हैं कि भारतीय संस्कृति की महानता को पहचानना और हमारी महान संस्कृति को नष्ट न करने का प्रयास करना आवश्यक है! चूंकि हिंदू धर्म/संस्कृति शाश्वत है, यह हर वस्तु ईश्वर के विभिन्न रूपों से संबंधित है। उदाहरण स्वरूप, जब ब्रह्मांड में गणेश तत्व प्रचुर मात्रा में है, तो ज्ञानवर्धक और विघ्नहर्ता श्री गणेश चतुर्थी; जब शक्ति तत्त्व अधिक हो, तब नवरात्र, शिवरात्र तब होती है जब ज्ञान, भक्ति और वैराग्यदायी शिवतत्व प्रचुर मात्रा में होता है। इसके विपरीत, अन्य संप्रदायों में महत्वपूर्ण दिन पृथ्वी पर हुई घटनाओं से जुड़े होते हैं।

हिंदू धर्म की महानता व मानसिक गुलामी की क्षुद्रता

- भारतीय संस्कृति पर आधारित शालिवाहन शक आदि शक का उपयोग वर्ष गणना के लिए न करते हुए अंग्रेजों की मानसिक गुलामी के कारण काल से किसी भी प्रकार का संबंध न रखने वाली यह पद्धति वर्ष गणना के लिए उपयोग में लाना आरंभ हुआ।

- गुड़ी पड़वा को निर्मिति के संबंधित प्रजापति लहरियां अधिक प्रमाण में पृथ्वी पर आती है, इसे वर्ष की शुरुआत के दिन के रूप में न मनाते हुए, अंग्रेजों की मानसिक गुलामी के रूप में 1 जनवरी को वर्षारंभ के दिन के रूप मनाना शुरू कर दिया।

- धनत्रयोदशी को आरोग्य के देवता धन्वंतरि के दिन के रूप में मानने की अपेक्षा, पश्चिमी लोगों का 'विश्व आरोग्य दिवस' मनाने की प्रथा बन गई है और इसका पालन होते हुए दिखाई देता है।

- श्री लक्ष्मी पूजा के दिन, जब श्री लक्ष्मी लहरियां अधिक प्रमाण में पृथ्वी पर आती है, इसे वित्तीय वर्ष की शुरुआत के दिन के रूप में नहीं मनाते, अपितु अंग्रेजों द्वारा शुरू किया गया 1 अप्रैल का दिन जो किसी भी तत्व पर आधारित नहीं है उसे वित्तीय वर्ष के शुरुआती दिन के रूप में मनाना शुरू हुआ।

ऐसे कई उदाहरण बताते हैं कि पाश्चात्य संस्कृति का कोई आधार नहीं है। केवल उनके जैसी कृति करने की अपेक्षा भारतीय संस्कृति को अपनाना और उसके अनुसार कार्य करना अधिक उपयुक्त है। इसके लिए भारतीय संस्कृति के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा या गुड़ीपड़वा को नववर्ष मनाएं!

Edited By: Rakesh Ranjan