मां के हाथ का वह निवाला, जो कभी नहीं भूलेगा हेमंत का मन; आज भी अमिट हैं मां रूपी सोरेन की यादें
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपनी मां रूपी सोरेन के हाथों से मिले निवाले को याद किया, जो उनके लिए ममता और आशीर्वाद का प्रतीक है।
-1791563090755_m.webp)
मां रूपी सोरेन बेटा सीएम हेमंत सोरेन को अपने हाथों से खाना खिलाते हुए। (इंटरनेट मीडिया)
HighLights
हेमंत सोरेन ने मां रूपी सोरेन के हाथों का निवाला याद किया।
झारखंड आंदोलन के दौरान मां ने परिवार और बच्चों को संभाला।
मां की ममता और आशीर्वाद जीवन की सबसे अमिट पूंजी है।
सुधीर गोराई, नीमडीह। वक्त कितना भी बदल जाए, कुछ तस्वीरें मन से कभी नहीं उतरतीं। उनमें एक तस्वीर ऐसी होती है, जिसमें मां अपने हाथों से निवाला खिलाती है।
वह निवाला सिर्फ अन्न का टुकड़ा नहीं होता, उसमें मां की ममता, चिंता, दुलार और आशीर्वाद घुला होता है। उम्र बढ़ती जाती है, जिम्मेदारियां बदलती जाती हैं और जीवन इंसान को कितनी ही ऊंचाइयों तक क्यों न पहुंचा दे, मां के हाथ से मिला वह निवाला स्मृतियों की सबसे सुरक्षित जगह में हमेशा बचा रहता है।
झारखंड आंदोलन के संघर्षों से निकलकर राज्य की राजनीति में अपनी पहचान बनाने वाले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के जीवन में भी मां का स्नेह ऐसी ही अमिट स्मृति है।
बचपन के वे दिन, जब परिवार संघर्षों के बीच जीवन की राह तलाश रहा था, आज बीते समय की तस्वीर बन चुके हैं। मगर उन तस्वीरों में मां का चेहरा और उनके हाथों से मिला स्नेह आज भी भावनाओं को झकझोर देता है।
संघर्ष के बीच मां ने संभाला परिवार
झारखंड आंदोलन का दौर आसान नहीं था। शिबू सोरेन के नेतृत्व में आंदोलन अपनी राह बना रहा था और परिवार को भी संघर्षों का सामना करना पड़ रहा था।
आंदोलन की उथल-पुथल के बीच घर और बच्चों की जिम्मेदारी संभालना मां के हिस्से आया। बच्चों को संभालना, उनमें संस्कार भरना और कठिन परिस्थितियों के बीच आगे बढ़ने का हौसला देना—यह सब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन की जीवन में किसी मौन संघर्ष से कम नहीं था।
बच्चे की पहली पाठशाला मां की गोद होती है। वह बोलना सीखने से पहले मां की आंखों से भाव समझता है और दुनिया को पहचानने से पहले मां के स्पर्श को पहचानता है। जीवन के शुरुआती वर्षों में मिले यही संस्कार आगे चलकर व्यक्तित्व की नींव बनते हैं।
एक निवाला, जिसमें था पूरा संसार
मां के हाथों के निवाला में चिंता थी—बच्चा भूखा न रह जाए। उसमें दुलार था, उसमें आशीर्वाद था जीवन में सफल हो। मुख्यमंत्री बनने के बाद हेमंत सोरेन की जिंदगी में जिम्मेदारियां कई गुना बढ़ीं।
राजनीतिक संघर्ष, सत्ता की चुनौतियां और सार्वजनिक जीवन की व्यस्तताएं उनके साथ चलती रहीं। मगर इन सबके बीच स्मृतियों में मां का स्नेह अपनी जगह बनाए रहा।
मां की तस्वीर, स्मृतियों में हमेशा जिंदा
मां का साथ जीवन से भले छूट जाए, लेकिन उसकी ममता नहीं छूटती। वह घर की चौखट, बचपन की गलियों, पुराने दिनों की यादों और सबसे बढ़कर संतान के मन में जीवित रहती है।
हेमंत सोरेन के लिए भी मां से जुड़ी यादें सिर्फ अतीत का हिस्सा नहीं हैं। वे उस जीवन-यात्रा की भावनात्मक पूंजी हैं, जिसने उन्हें संघर्षों से लड़ना सिखाया। मां के हाथ का वह निवाला आज भले सामने न हो, लेकिन उसकी अनुभूति स्मृतियों में हमेशा रहेगी।
सत्ता की कुर्सी बदल सकती है, समय बदल सकता है, जिंदगी की राह बदल सकती है—लेकिन मां के हाथ से मिला निवाला कभी पुराना नहीं होता।
वह हर उम्र में उतना ही अपना रहता है। हेमंत सोरेन के जीवन में भी मां की ममता का वह निवाला इसी तरह हमेशा जिंदा रहेगा।
यह भी पढ़ें- अस्वस्थ हालत में भी पति शिबू सोरेन का सम्मान लेने दिल्ली पहुंची थीं रूपी सोरेन; राष्ट्रपति ने सौंपा था पद्म भूषण
