जमशेदपुर, दिलीप कुमार।  मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम 14 वर्षों के वनवास के दौरान झारखंड के ईचगढ़ क्षेत्र में दिन गुजारे थे। इस दौरान वे इस क्षेत्र में न सिर्फ दिन गुजारे बल्कि कई ऐसे काम भी किए जिनकी कई ऐतिहासिक निशानी क्षेत्र में आज भी मौजूद है। मान्यताओं पर आधारित इससे संबंधित कई दंतकथाएं क्षेत्र में आज भी सुनी व सुनाई जाती हैं। 

जमशेदपुर से करीब 70 किलोमीटर पश्चिम-उत्तर की ओर स्थित ईचगढ़ के आदरडीह गांव की सीमा पर स्थापित माता सीता के मंदिर पर लोगों का अटूट आस्‍था है। कुछ भक्त रोज मंदिर में पहुंचकर माता सीता के दर्शन-पूजन करते हैं। रामायण के काल के अलावा क्षेत्र में महाभारत काल की भी कुछ निशानियां मौजूद हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण जयदा मंदिर के पास पासा खेलने के लिए चट्टान पर बनाए गए निशान और किसी लिपि में लिखे शिलालेख शामिल हैं। मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों भी इसी क्षेत्र में दिन गुजारे थे।

पेड़ की डाली पर रखकर माता सीता ने सुखाए थे बाल

ईचगढ़ प्रखंड के चितरी, आदरडीह और चिमटिया के सीमा पर स्थित चट्टान पर माता सीता के पैर के निशान तो कुकडू प्रखंड के पारगामा क्षेत्र में भगवान श्रीराम के तीर की नोक से खोदे गए जलस्रोत लोगों के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है। क्षेत्र में प्रचलित दंतकथा के अनुसार वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने इस क्षेत्र में भी दिन बिताए थे। कहते हैं कि एक दिन माता सीता स्नान करने के लिए पानी की तलाश कर रही थी। पानी नहीं मिलने पर उन्होंने प्रभु श्रीराम से पानी खोजने में मदद मांगी। प्रभु श्रीराम ने अपने धनुष-वाण से भूगर्भ जल का स्रोत निकाला, जहां माता सीता ने स्नान किया। भूगर्भ जल के स्रोत से जो जलधारा बहने लगी उसे लोग अब सीता नाला के नाम से जानते हैं। गर्मी के मौसम में भी सीता नाला का पानी नहीं सूखता है। जहां पर माता सीता ने स्नान किया था वहां अब भी जल का स्रोत निकलता रहता है। इसी नाला के किनारे एक अर्जुन का पेड़ था। कहते हैं कि माता सीता ने स्नान करने बाद उसी अर्जुन के पेड़ की डाली पर अपने बाल रखकर सुखाए थे। उस पेड़ की डाली पर अंत तक बाल जैसा काला रेशा निकलता रहता था। 15-16 वर्ष पहले पेड़ गिर गया, जिसके बाद लोग पेड़ की डाली को ले गए।

मौजूद हैं पैरों के निशान

सीता नाला के चट्टानों पर अब भी पैरों के निशान हैं। यहां एक चट्टान पर तीन जोड़े और एक चट्टान पर दांए पैर का एक निशान मौजूद है, जिसे लोग माता सीता के पैरों का निशान मानकर पूजा-अर्चना करते हैं। इसी स्थान पर माता सीता का एक मंदिर है। मंदिर के अंदर माता सीता की प्रतिमा भी स्थापित है। जिसका निर्माण 1977 में एक सेवानिवृत शिक्षक ने अपनी मनोकामना पूरी होने पर कराया था। कहते हैं कि यहां माता सीता का स्मरण कर मन्नत मांगने पर वह पूरा होता है। यहां प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर एक दिवसीय मेला का आयोजन होता है।

सीता नाला लोगों के लिए वरदान

वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण इस क्षेत्र में भी आए थे। इस दौरान प्रभु ने यहां भी दिन गुजारे थे। सीता नाला क्षेत्र के लोगों के लिए वरदान जैसा है। बारह महीने पानी और इसका ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व खुशी का अनुभव कराता है। माता के पैरों के निशान इसका प्रमाण है कि प्रभु श्रीराम अपने भाई और माता सीता के साथ इस क्षेत्र में आए थे।

- रासबिहारी महतो, चोगा, ईचागढ़

कभी कम नहीं होता सीताकुंड का पानी

कुकड़ू प्रखंड के पारगामा गांव में एक चुआं है जिसे लोग सीताकुंड कहते हैं। मान्यता है कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम ने तीर की नोक से जलकुंड का निर्माण किया था। इस चुआं से बारह महीने निरंतर जलधारा बहती है। क्षेत्र में प्रचलित दंतकथा के अनुसार वनवास के दौरान माता सीता की प्यास बुझाने के लिए भगवान श्रीराम ने तीर की नोक से कुंड का निर्माण किया था। उस समय से उस चुआं से निरंतर जलधारा निकलतीहै। मात्र चार से पांच फीट की गहराई वाले चुआं से करीब आधा दर्जन गांवों के लोग आज भी अपनी प्यास बुझाते हैं। लोककथा के अनुसार इस चुआं का संबंध यहां से करीब लगभग 30 किलोमीटर दूर पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिला के अयोध्या पहाड़ स्थित सीताकुंड से है ।

 

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