मनोज सिंह, जमशेदपुर : कोरोना काल से पहले जहां दुर्गापूजा के दौरान मूर्ति निर्माण में जुटे कारीगरों की चांदी ही चांदी रहती थी। एक-एक मूर्ति निर्माता अपने पास बाहर से कारीगर बुलाकर दर्जनों मूर्ति का निर्माण करते थे। साल के दो महीने तक मूर्ति निर्माण में जुट जाते थे। इससे सालों भर का खर्च निकल जाता था। आराम से जिंदगी चलती थी, लेकिन जब से कोरोना महामारी आया तब से मूर्ति कारीगर अर्श से नीचे फर्श तक पहुंच गए।

मानगो टीचर्स कॉलोनी निवासी मूर्ति कारीगर नारायण चंद्र पाल कहते हैं कि मैं तो 1979 से मूर्ति बनाने का काम से जुड़ा हुआ हूं। पहले बाहर से आधा दर्जन कारीगर और हेल्पर को मूर्ति निर्माण में सहयोग करने के लिए बुलाते थे, लेकिन आज स्थिति इतनी दयनीय हो गयी है कि पश्चिम बंगाल के मिदनापुर से मात्र एक कारीगर को ही सहयोग करने के लिए बुलाया। सरकार को मूर्ति कारिगरों की कोई चिंता नहीं है।

पहले बड़ी मूर्ति के लिए मिलते थे 30-35 हजार रुपये

मूर्ति निर्माता नारायण पाल कहते हैं कि कोरोना काल से पहले बड़ी मूर्ति बनाते थे, जिसकी कीमत 30 से 35 हजार रुपये तक होती थी। पूजा के दौरान 22-25 मूर्ति बनाते थे, लेकिन आज सरकार की गाइड लाइन के कारण चार- पांच फीट की मूर्ति बनायी जा रही है जिससे मूर्ति की कीमत 12 हजार से लेकर 20 हजार रुपये तक है। पूजा समिति के लोग अब पैसा भी खर्च करना नहीं चाह रहे। यही कारण है कि इस बार मुश्किल से 12 मूर्ति का निर्माण कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि बीते साल एक बड़ी मूर्ति का निर्माण किया था, लेकिन सरकार का गाइडलाइंस के कारण पूजा समिति आर्डर देने के बाद मूर्ति नहीं ले गयी। वहीं दूसरी ओर काशीडीह लाइन नंबर पांच निवासी मूर्ति निर्माता संदीप पॉल कहते हैं कि इस वर्ष 20 समिति द्वारा मूर्ति निर्माण करने का आर्डर आया है। लेकिन मूर्ति का ऊंचाई मात्र 5 फीट का रहने के कारण पहले की तुलना में कमाई नहीं के बराबर हो गई है। उन्होंने बताया कि बाहर से चार कारीगर को मूर्ति निर्माण में सहयोग करने के लिए बुलाए हैं।

कोलकाता से मंगायी गयी मिट्टी

मूर्ति निर्माता नारायण चंद्र पाल कहते हैं कि मूर्ति निर्माण के लिए कोलकाता से गंगा तट की मिट्टी मंगाई गई है। उन्होंने बताया कि दुर्गा मां की मूर्ति की साज सज्जा के लिए सामग्री भी कोलकाता से मंगायी गयी है। नारायण पाल कहते हैं कि चूंकि कोलकाता के गंगा के किनारे की मिट्टी को उपयोग चेहरा व मूर्ति की बाहरी आवरण को चिकना करने के उपयोग में लाया जाता है। बाकि मिट्टी पारडीह के कुछ इलाके से मंगाए जाते हैं। दोनों मिट्टी मिलाकर मूर्ति का निर्माण किया जाता है। उन्होंने बताया कि सोमवार से मूर्ति का रंगा रोंगन का काम कार्य शुरू किया जाएगा।

42 साल की मूर्ति निर्माण में ऐसा दिन नहीं देखा

मूर्ति निर्माण में जुटे कारीगर नारायण पाल कहते हैं कि अपने 42 साल के मूर्ति निर्माण के दौरान ऐसा समय कभी नहीं देखा। आज वह खुद कड़ी मेहनत कर रहे हैं। नारायण चंद्र पाल कहते हैं कि आज दिन ऐसा खराब हो गया है कि पत्नी कल्याणी पाल, पुत्र संदीप पॉल व साैरव पाल सबको काम करना पड़ रहा है।

 

Edited By: Rakesh Ranjan