जागरण संवाददाता, जमशेदपुर : अटल बिहारी वाजपेयी नेता नहीं राजनेता थे। वे सिर्फ एक चुनाव को जीतने के बारे में नहीं सोचते थे बल्कि पूरी नई पीढ़ी को गढ़ने के बारे में प्रयासरत रहते थे। इसीलिए प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने देश को ताकतवर बनाने का जो आधार तैयार किया, उसी का प्रतिफल है कि आज भारत की प्रतिष्ठा पूरे विश्व में नए अंदाज में फैल रही है। और, हमारे देश की विशेषता रही है कि अटलजी जैसा महापुरूष नश्वर शरीर त्यागने के बाद फिर अपने देश में जन्म लेता है। प्रकृति हर चीज को लौटाती है, समय जो लगे। यही कारण है कि मेरा पूरा विश्वास है कि अटल जी नया जन्म लेकर एक दिन जरूर लौटेंगे और अपने देश में फिर उनके दौर की उदारमना सियासत चमक उठेगी।

ये विचार राष्ट्रवादी विचारधारा के पैरोकार, जानेमाने शिक्षाविद् और अटल जी के आशीर्वाद से ही सियासत की दुनिया में शुचिता का झंडा बुलंद करनेवाले नेता महेश शर्मा व्यक्त किए। वे दैनिक जागरण की अकादमिक बैठक 'जागरण विमर्श' को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। बैठक का विषय था विषय था-क्या आज संभव है अटल जी के दौर वाली राजनीति।

अपने सारगर्भित संबोधन में शर्मा ने अटल जी और जमशेदपुर से जुड़े कई प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि बेशक आज के दौर में अटल जी के काल वाली उदारमना सियासत नहीं देखी जा रही। सिद्धांतों या विचारधारा पर अटल रहने के गुण का भी लोप होता जा रहा जो अटलजी की राजनीतिक कार्यशैली का आधार रहा करता था। लेकिन सत्ता के लिए स्वार्थ की राजनीति करने का दौर एक न एक दिन अवश्य खतम होगा, क्योंकि देश सिद्धांतों व विचारधारा के बुनियाद पर ही आगे बढ़ सकता है। तरक्की कर सकता है।

शर्मा ने कहा कि जनसंघ नेता के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी 1974 में जमशेदपुर आए थे। पहली ही नजर में अटल जी ने गजब की छाप छोड़ी थी। तब उनके (महेश शर्मा) जैसे अनेक युवा जनसंघ की आकर्षित हुए थे और बाद में भाजपा को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दिया। अब भी दे रहे हैं।

अटल जी के मृदुल व्यवहार, सौम्य चरित्र व कवित्व स्वभाव को देश की सियासत के लिए धरोहर बताते हुए शर्मा ने कहा कि अपनी ईमानदारी, कर्मठता व राष्ट्रभक्ति से उन्होंने कई अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए। प्रधानमंत्री के रूप में पोखरन परमाणु परीक्षण से जरिए उन्होंने महाबली अमेरिका समेत पूरे देश को संदेश दिया कि वे न सिर्फ सिद्धांत के अटल हैं बल्कि काम के भी अटल हैं। पूर्व प्रधानमंत्री को दूरदर्शी राजनेता के रूप में निरूपित करते हुए उन्होंने कहा कि देश के ढांचागत विकास से लेकर अंतरिक्ष में कदम रखने व संचार क्रांति का सूत्रपात करने में अटल जी ने प्रधानमंत्री के रूप में जैसा काम किया, उसे सदियों तक याद किया जाता रहेगा।

उन्होंने कहा कि अटल जी हमेशा देश के बारे में सोचते थे। पार्टी उनके लिए बाद में आती थी। सर्वधर्म समभाव मे विश्वास रखते थे और गरीबों के विकास को लेकर हमेशा प्रयत्नशील रहते थे। नैतिक साहस को उनमें गजब का था। यही कारण है कि कई बार अहम मुद्दों पर उनका स्टैंड पार्टी लाइन के विपरीत प्रतीत हुआ लेकिन कालांतर में अटल जी ही सही निकले।

उनकी कविताओं, पाठ करने के तरीके व कवि हृदय को याद करते हुए शर्मा ने कहा कि इसी का परिणाम रहा कि वे पाकिस्तान से मधुर संबंध बनाने के हिमायती थे और अपने स्तर से कई बार पहल भी की थी। यह बात अलग है कि किन्हीं वजहों के पाकिस्तान उनकी पहल के महत्व को नहीं समझ सका और अटल जी की यह आस पूरी नहीं हो सकी।

परिवारवाद से ऊपर रहने, विरोधियों के विचारों को भी महत्व देने और सबको साथ लेकर देश के विकास के लिए काम करने में यकीन रखनेवाले अटल जी अपने व्यक्तित्व की इन्हीं विशेषताओं के कारण हर किसी के अजीज थे। राष्ट्रहित के मुद्दों पर दलदल में नहीं फंसे। विरोधी भी उनकी बातों को ध्यान से सुनते थे। उन्हें पूरा मान-सम्मान देते थे। कई बार कांग्रेस की सरकारों ने भी देश की आवाज को विदेशी मंच पर बुलंद करने के लिए अटल जी को इसीलिए चुना था।

महेश शर्मा ने राजधर्म को लेकर अटल जी के अटल सिद्धांत को 2002 के गुजरात के संदर्भ में याद किया और कहा कि किसी मुख्यमंत्री को राजधर्म का पालन करने की सीख उनके जैसा कोई उदार व मजबूत राजनेता ही दे सकता है।

उन्होंने पूरे विश्वास के साथ कहा कि भारत हमेशा से अटल जी जैसे व्यक्ति्व का ही कायल रहा है, कालखंड जो रहा हो। इसलिए हमारी प्रकृति एक न एक दिन अटल जी को हमें अवश्य लौटाएगी और तब हम फिर उदार राजनीति की अनुभूति कर सकेंगे। शर्मा ने अटल जी की ही एक कविता को उद्धृत करते हुए कहा कि कूच करने से पहले वे खुद कह कर गए हैं- लौट कर आऊंगा, कूच से क्यों डरें। देश को अटल जी के लौटने का इंतजार रहेगा।

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Posted By: Jagran

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