मां दुर्गा की आराधना में हर वर्ग का सम्मान: जानिए क्यों कोलकाता की निषिद्ध पल्ली से मंगवाई जाती है विष्णुगढ़ की पूजा के लिए मिट्टी
हजारीबाग के विष्णुगढ़ में सात माइल रमुआ की दुर्गा पूजा अपनी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है, जहां मां दुर्गा ...और पढ़ें

हजारीबाग जिले के विष्णुगढ़ स्थित 'सात माइल रमुआ' की प्रसिद्ध दुर्गा पूजा में कोलकाता की निषिद्ध पल्ली की पवित्र मिट्टी का उपयोग किया जाता है।
HighLights
विष्णुगढ़ दुर्गा पूजा में निषिद्ध पल्ली की मिट्टी का उपयोग।
यह परंपरा 2008 से सामाजिक समरसता दर्शाती है।
जासं, विष्णुगढ़ (हजारीबाग)। सनातन परंपरा की विशालता, उदारता और सामाजिक समरसता का एक अद्भुत और भावुक कर देने वाला उदाहरण हजारीबाग जिले के विष्णुगढ़ स्थित 'सात माइल रमुआ' की प्रसिद्ध दुर्गा पूजा में देखने को मिलता है।
यहां मां भगवती की भव्य प्रतिमा के निर्माण में केवल साधारण मिट्टी और गोबर ही नहीं, बल्कि विशेष रूप से कोलकाता की निषिद्ध पल्ली (वेश्यालय क्षेत्र) की पवित्र मिट्टी का उपयोग किया जाता है।
वर्ष 2008 में जब यहां पहली बार दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई थी, तभी से यह परंपरा बिना किसी व्यवधान के पूरी निष्ठा, श्रद्धा और सम्मान के साथ निभाई जा रही है।
कोलकाता में विधिवत विनती और सगुन की परंपरा
इस अनूठी परंपरा को निभाने के लिए हर साल सात माइल रमुआ दुर्गा पूजा समिति के सदस्य प्रतिमा के साज-सज्जा का सामान खरीदने पश्चिम बंगाल के कोलकाता जाते हैं। पूजा की कोई भी सामग्री खरीदने से पहले समिति के कार्यकर्ता निषिद्ध पल्ली के द्वार पर पहुंचते हैं।
वहां वे बेहद सादगी और विनम्रता के साथ स्थानीय महिला से मां दुर्गा की प्रतिमा निर्माण के लिए थोड़ी सी मिट्टी देने का आग्रह करते हैं। जब महिला इस विनती को स्वीकार कर लेती है, तो वे उन्हें अगले दिन आने का निर्देश देती हैं।
सम्मान में झुकते हैं सिर, झोली में मिलती है मिट्टी
इसके सम्मानस्वरूप पूजा समिति की ओर से महिला को सगुन के रूप में नए वस्त्र, शॉल और उपहार भेंट किए जाते हैं। तय समय पर कार्यकर्ता पुनः उसी निष्ठा और श्रद्धा के साथ द्वार पर पहुंचते हैं।
जब तक महिला सामने नहीं आतीं, कार्यकर्ता उनके सम्मान में सिर झुकाकर खड़े रहते हैं। इसके बाद महिला स्वयं आगे आकर पूरी गरिमा के साथ कार्यकर्ताओं की झोली में मिट्टी अर्पित करती हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में न केवल आस्था झलकती है, बल्कि मानवीय गरिमा और सामाजिक समावेशिता का एक गहरा भाव भी महसूस होता है।
सामाजिक समरसता और सनातन संस्कृति का संदेश
सात माइल रमुआ की दुर्गा पूजा में निभाई जाने वाली यह रीती केवल मूर्ति गढ़ने की एक प्रक्रिया भर नहीं है। यह समाज को यह स्पष्ट संदेश देती है कि मां जगदम्बा की आराधना के इस महा-अनुष्ठान में समाज के हर वर्ग, हर व्यक्ति का योगदान और महत्व अमूल्य है।
यह परंपरा सनातन संस्कृति के उस मूल दर्शन को पुनर्जीवित करती है, जहां उपेक्षा नहीं बल्कि सम्मान, समरसता और हर जीव के प्रति आदर भाव निहित है।
यही कारण है कि सात माइल रमुआ की दुर्गा पूजा आज पूरे क्षेत्र में अपनी इस अनूठी और प्रेरक परंपरा के लिए विशेष पहचान रखती है।
