हजारीबाग के मानगढ़ में मिला 3200 साल पुराना मृदभांड, प्राचीन नगरीय सभ्यता का खुलासा; 300 मूर्तियां ASI के रिकाॅर्ड में दर्ज
हजारीबाग के मानगढ़ में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को 3,200 साल पुराने मृदभांड और प्राचीन नगरीय सभ्यता के साक्ष्य मिले हैं। ...और पढ़ें

मानगढ में जमीन के अंदर से निकले तलवार को दिखाते ग्रामीण। (तस्वीर: शशि शेखर)
HighLights
चौपारण, इटखोरी, मयूरहंड में अवशेषों का दस्तावेजीकरण।
उत्तरी काले चमकीले मृदभांड से नगरीय सभ्यता की पुष्टि हुई।
एएसआई द्वारा वैज्ञानिक खुदाई की तैयारी और दस्तावेजीकरण जारी।
शशि शेखर, चौपारण (हजारीबाग)। हजारीबाग जिले के प्रखंड स्थित मानगढ़ गांव में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को लगभग 3,200 वर्ष पुराने मृदभांड के साक्ष्य मिले हैं। विशेष रूप से उत्तरी काले चमकीले मृदभांड यानी एनबीपीडब्लू की प्राप्ति, पकी ईंटों की संरचना और टेराकोटा रिंग-वेल से पुरातत्वविदों का मानना हैं कि यहां प्राचीन काल में एक विकसित नगरीय अधिवास था।
मानगढ़ के ऐतिहासिक टीले से प्राप्त एनबीपी डब्लू इस खोज का सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। यह काला, चमकदार और उच्च गुणवत्ता वाला मृदभांड हैं, जिसे प्रारंभिक ऐतिहासिक काल और महाजनपद-मौर्य काल से जोड़ा जाता हैं।
सहायक पुरातत्वविद डाॅ. नीरज मिश्रा के अनुसार, मानगढ़ के टीले से इस मृदभांड का मिलना इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि यहां एक नगरीय अधिवास रहा होगा। पकी ईंटों की संरचनाएं और विभिन्न प्रकार के मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े इस निष्कर्ष को और मजबूत करते हैं।
डॉ. मिश्रा के अनुसार यह स्थल प्राचीन उत्तरापथ पर स्थित रहा हैं। इसलिए यहां केवल कृषि बस्ती के साथ व्यापारिक और सांस्कृतिक गतिविधि का केंद्र भी हो सकता था। टीले के सबसे निचले स्तर से मिले काले और लाल मृदभांड इस स्थल की प्राचीनतम परतों की ओर इशारा करते हैं। उन्होंने प्राप्त मृदभांड को लगभग 3200 साल पुराना बताया।

मानगढ़ गांव के बीच बड़ा हिस्सा वर्षों से रहस्य का केंद्र
दरअसल मानगढ़ गांव के बीच स्थित विशाल टीला व गांव का बड़ा हिस्सा वर्षों से रहस्य का केंद्र रहा हैं। पहले इसे झारखंड का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप माना गया था। तत्कालीन पुरातत्व अधीक्षक एमजी निकोसे ने इसे लगभग एक एकड़ में फैला बौद्ध धरोहर बताया था।
अब नए साक्ष्यों के आधार पर डाॅ. मिश्रा इसे बुद्ध काल से पहले की परतों से जोड़ने की संभावना जता रहे हैं। टीले के निचले हिस्से में बड़ी ईंटों से बनी दीवारें स्पष्ट दिखती हैं, जो किसी विशाल भवन या स्मारक संरचना के अस्तित्व का संकेत देती हैं।
पुरातत्वविदों का मानना हैं कि इस टीले की वैज्ञानिक खुदाई होना आवश्यक हैं। इसके लिए एएसआई विस्तृत रिपोर्ट के साथ खुदाई का प्रस्ताव देने की तैयारी में हैं। मानगढ़ की सबसे बड़ी विशेषता यह हैं कि यहां लगभग 3,500 वर्षों के अवशेष एक ही क्षेत्र में मिल रहे हैं।
प्राचीन भवनों के अवशेष और टेराकोटा रिंग-वेल
प्रारंभिक ऐतिहासिक काल के मृदभांड, पकी ईंटें, टेराकोटा रिंग-वेल, शिवलिंग, नंदी, सूर्य प्रतिमा और स्तूप से जुड़े हैं। ग्रामीणों के अनुसार शिवलिंग, नंदी और सूर्य प्रतिमा जैसे अवशेष खेतों की जुताई, तालाब या घरों की नींव खोदने के दौरान जमीन से निकले थे। पुरातत्व विभाग ने इन सभी अवशेषों का दस्तावेजीकरण शुरू कर दिया हैं।
गांव में कुछ घरों की नींव खोदते समय जमीन के नीचे प्राचीन भवनों के अवशेष और टेराकोटा रिंग-वेल भी मिले। एक ग्रामीण के पास प्राचीन तलवार भी सुरक्षित हैं, जिसे पुरातत्व टीम ने देखा और दस्तावेज में शामिल किया। महाने, लेढिया और अन्य छोटी नदियों के किनारे बसे ये गांव सभ्यता के विकास के स्पष्ट संकेत देते हैं।
पुरातत्व विभाग कर रहा सर्वेक्षण
बीते दो दशकों के अधिक समय से दैनिक जागरण इन तथ्यों को सामने ला रहा हैं। पुरातत्व विभाग ने इसकी पुष्टि कर दी हैं। विभाग के रांची अंचल के सहायक पुरातत्व विद डा नीरज मिश्रा व छायाकार कुंदन झा चौपारण, इटखोरी और मयूरहंड के पौराणिक मूर्तियों का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं।
टीम बीते तीन माह से लगातार इन गांवों में घूमकर एक एक मूर्तियों का अभिलेख तैयार कर रहे हैं। टीम जैसे जैसे निरीक्षण कर रही इतिहास की बड़ी जानकारियां सामने आ रही हैं। लगभग तीन सौ मूर्तियों का दस्तावेजीकरण किया जा रहा हैं।

एनबीपीडब्लु बड़ा साक्ष्य, हर काल के मृदभांड बरामद
मानगढ़ में एनबीपीडब्लु मिलने से एएसआई की टीम काफी उत्साहित हैं। दोगुने उत्साह से क्षेत्र के समग्र इतिहास का डाॅक्यूमेंटेशन किया जा रहा हैं। मानगढ़ में टीले के नीचे हर काल के मृदभांड बरामद किए गए। लाल काले मृदभांड की अवधि और अधिक प्राचीन बताई गई।
इसके पूर्व नालंदा विश्वविद्यालय के एक्सपर्ट डाॅ विश्वजीत कुमार ने भी जागरण संवादाता के प्रयास से मानगढ़ आकर निरीक्षण किया और मृदभांड की जांच के बाद पुष्टि की थी।
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