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हजारीबाग के जंगलों में हजारों साल पुराना इतिहास: ASI को चौपारण में मिले बौद्ध, जैन और सनातन संस्कृति के प्राचीन प्रमाण

Published: Sat, 26 Sep 2026 12:09 PM (IST)

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की टीम ने चौपारण के जंगलों में प्राचीन पुरातात्विक अवशेषों का निरीक्षण किया, जिसमें बौद्ध देवी ...और पढ़ें

प्राचीन उत्तरापथ पर स्थित होने के साथ-साथ बौद्ध, जैन और सनातन धर्म से जुड़े प्रमाण प्रस्तुत करता है।

प्राचीन उत्तरापथ पर स्थित होने के साथ-साथ बौद्ध, जैन और सनातन धर्म से जुड़े प्रमाण प्रस्तुत करता है।

HighLights

  1. एएसआई टीम ने चौपारण के पुरातात्विक स्थलों का निरीक्षण किया।

  2. सिलोदर में मिली 7वीं-8वीं सदी की बौद्ध देवी तारा प्रतिमा।

  3. मुर्तिया गांव में मनौती स्तूप और अन्य प्राचीन अवशेष मौजूद।

शशि शेखर, हजारीबाग(चौपारण)। चौपारण की धरती हजारों वर्ष पुराने पुरातात्विक अवशेषों से समृद्ध है। प्रखंड के दुर्गम जंगल और पहाड़ी क्षेत्रों में जगह-जगह बिखरे पुरावशेष एक बार फिर इस क्षेत्र की प्राचीन ऐतिहासिकता को प्रमाणित कर रहे हैं।

शुक्रवार को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), रांची अंचल की टीम ने चोरदाहा पंचायत के सिलोदर, छोटकी मुर्तिया और बड़की मुर्तिया सहित आसपास के जंगली क्षेत्रों का भ्रमण कर वहां मौजूद प्राचीन मूर्तियों और अन्य पुरातात्विक अवशेषों का निरीक्षण किया।

एएसआई रांची मंडल के सहायक पुरातत्वविद् डॉ. नीरज मिश्रा ने इन स्थलों का निरीक्षण किया। उन्होंने बताया कि अधीक्षण पुराविद डॉ. करबी साहा के निर्देशन में चौपारण क्षेत्र के पुरातात्विक स्थलों का सर्वेक्षण कराया जा रहा है। इस क्रम में प्रमुख पुरास्थलों पर मौजूद पुरावशेषों का दस्तावेजीकरण और रिपोर्ट तैयार की जा रही है।

डॉ. मिश्रा के अनुसार चौपारण प्राचीन उत्तरापथ पर स्थित महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। यहां से कई सहायक मार्ग झारखंड के अन्य हिस्सों, लंबी दूरी वाले मार्गों और छोटानागपुर के पठारी क्षेत्र से जुड़ते रहे हैं। क्षेत्र में बौद्ध और जैन परंपरा के साथ सनातन धर्म से जुड़े पुरातात्विक साक्ष्य भी बड़ी संख्या में मिलते हैं।

उन्होंने बताया कि चौपारण के घने जंगलों और दुर्गम रास्तों के बीच बौद्ध देवी तारा, मनौती स्तूप, प्राचीन शिवलिंग, प्रस्तर प्रतिमाएं और मंदिर संरचनाओं के अवशेष मौजूद हैं। ये अवशेष इस क्षेत्र में प्राचीन आवागमन के साथ सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों के विस्तार की ओर संकेत करते हैं। इस दौरान उनके साथ विभाग के वरिष्ठ छायाकार कन्हैया कुमार झा, जगदीश यादव, राजकुमार यादव, कृष्णा पासवान, प्रभात यादव, उज्जवल यादव, राहुल कुमार सहित अन्य मौजूद रहे।

शताब्दी पूर्व पड़ा मुर्तिया गांव का नाम

ग्रामीणों के अनुसार मुर्तिया गांव का नामकरण आज से करीब सौ वर्ष पूर्व सरकारी दस्तावेजों में किया गया था। स्थानीय लोगों का कहना है कि जंगल क्षेत्र में प्राचीन मूर्तियां मिलने के कारण गांव का नाम मुर्तिया पड़ा। छोटकी मुर्तिया और बड़की मुर्तिया में दशकों पूर्व ग्रामीणों को कई प्राचीन प्रस्तर मूर्तियां मिली थीं।

इन मूर्तियों को ग्रामीणों ने मंदिर बनाकर सुरक्षित रखा और कई स्थानों पर शिवलिंग मानकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी। सिलोदर में भी करीब तीन दशक पूर्व जंगल और नदी किनारे मिली एक प्राचीन प्रतिमा को समाजसेवी जगदीश यादव ने अपने होटल परिसर में मंदिर बनाकर संरक्षित किया है। एएसआई टीम के निरीक्षण में यह प्रतिमा बौद्ध धर्म की देवी तारा की बताई गई है।

प्रतिमा के मस्तक पर गौतम बुद्ध की विभिन्न मुद्राओं वाली आकृतियां दिखाई देती हैं। वहीं बड़की मुर्तिया में मनौती स्तूप सहित कई अन्य पुरातात्विक अवशेष मौजूद हैं, जिनके विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता है।

चौपारण के दैहर, सोहरा, हथिंदर, मानगढ़, चैथी और पपरो सहित अन्य क्षेत्रों में पहले भी प्राचीन मूर्तियां, स्थापत्य अवशेष और अन्य पुरातात्विक साक्ष्य सामने आ चुके हैं। मुर्तिया और सिलोदर का जुड़ना इस पुरातात्विक श्रृंखला को और विस्तृत करता है।

दैनिक जागरण द्वारा पिछले दो दशकों से चौपारण की पुरातात्विक विरासत को लगातार सामने लाने का प्रयास किया जाता रहा है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और वैज्ञानिकों के अध्ययन तथा स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत लगातार सामने आ रही है।

सिलोदर में ढाई फुट की मां तारा की अद्भुत प्रतिमा

सिलोदर निवासी समाजसेवी जगदीश यादव को करीब 30 वर्ष पूर्व जंगल में भ्रमण के दौरान नदी किनारे लगभग ढाई तीन फुट ऊंची प्राचीन प्रतिमा मिली थी। उन्होंने प्रतिमा को अपने होटल परिसर में लाकर मंदिर बनाकर स्थापित किया और तब से नियमित रूप से पूजा-अर्चना कर रहे हैं। एएसआई टीम के निरीक्षण में प्रतिमा को बौद्ध धर्म की देवी तारा की प्रतिमा बताया गया।

ललिता आसान में देवी तारा की यह दुर्लभ प्रतिमा है। इसके सातवीं-आठवीं शताब्दी से संबंधित होने के संकेत मिले हैं। हालांकि डॉ. नीरज मिश्रा ने कहा कि प्रतिमा की वास्तविक काल निर्धारण और स्वरूप की पुष्टि के लिए विस्तृत अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इन जंगलों में अभी बहुत कुछ छिपा हो सकता है।

गौतम बुद्ध के बोधगया जाने वाले प्राचीन मार्ग के भी मिल रहे साक्ष्य

चौपारण से बोधगया और इटखोरी के बीच प्राचीन आवागमन मार्ग होने के संकेत लगातार मिल रहे हैं। क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर यह संभावना मजबूत होती है कि प्राचीन काल में महाने नदी और जंगलों के रास्ते आवागमन होता रहा होगा।

बोधगया से चौपारण के चोरदाहा, मुर्तिया और सिलोदर होते हुए हथिंदर, सोहरा, दैहर और इटखोरी तक जाने वाला मार्ग आज भी जंगली हिस्सों में मौजूद है। इसी मार्ग के आसपास प्राचीन मूर्तियों और अन्य अवशेषों का मिलना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इन तथ्यों को लेकर दैनिक जागरण पिछले 22 वर्षों से लगातार रिपोर्टिंग और शोधपरक सामग्री प्रकाशित करता रहा है।

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गहन अध्ययन और दस्तावेजीकरण की जरूरत

चौपारण के जंगलों में लगातार सामने आ रहे पुरातात्विक साक्ष्यों के बाद पूरे क्षेत्र के व्यवस्थित सर्वेक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है। एएसआई की टीम द्वारा पुरास्थलों का दस्तावेजीकरण किया जा रहा है, लेकिन संरक्षण और विकास के लिए व्यापक सरकारी योजना की जरूरत है।

यदि इन स्थलों का वैज्ञानिक तरीके से सर्वेक्षण, संरक्षण और विकास किया जाए तो चौपारण को महत्वपूर्ण पुरातात्विक एवं पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।

वन विभाग निभा सकता है महत्वपूर्ण भूमिका

चौपारण के बड़े हिस्से में जंगल और पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण पुरातात्विक स्थलों के संरक्षण में वन विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। जंगलों में बिखरे प्राचीन अवशेषों की पहचान, सुरक्षा और पहुंच मार्ग विकसित करने के लिए वन विभाग, पुरातत्व विभाग और जिला प्रशासन को संयुक्त रूप से मेगा प्लान तैयार करने की जरूरत है। इससे पुरातात्विक विरासत के साथ प्राकृतिक धरोहर का भी संरक्षण हो सकेगा। क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय पर्यटन का बडा केंद्र बन सकता है।

स्थानीय लोगों ने सदियों से संभालकर रखी विरासत

चौपारण के ग्रामीणों ने प्राचीन पुरातात्विक अवशेषों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दैहर, हथिंदर, सोहरा, मानगढ़, चैथी सहित कई गांवों में ग्रामीणों ने वर्षों से प्राचीन मूर्तियों को सुरक्षित रखा है। अब मुर्तिया और सिलोदर में भी ग्रामीणों द्वारा मूर्तियों को मंदिर बनाकर संरक्षित करने का उदाहरण सामने आया है।

जगदीश यादव, राजकुमार यादव, श्यामलाल तुरी, बंसी यादव, राजदेव यादव, प्रभात यादव और सुखदेव पासवान सहित स्थानीय लोगों ने संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाई है। एएसआई टीम ने भी स्थानीय लोगों द्वारा पुरावशेषों को सुरक्षित रखने के प्रयासों को महत्वपूर्ण बताया।

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