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गोबर और मिट्टी के रंगों से दीवारों पर उतर रही प्रकृति, हजारीबाग की महिलाओं के हाथों से जीवंत सोहराई पेंटिंग

Published: Wed, 04 Nov 2026 05:13 PM (IST)

Diwali Special: हजारीबाग की महिलाएं सोहराई और कोहबर पेंटिंग के माध्यम से झारखंड की समृद्ध लोककला को जीवित रख रही ...और पढ़ें

हजारीबाग की महिलाओं ने सोहराई पेंटिंग से झारखंड की लोककला को दी नई पहचान।

हजारीबाग की महिलाओं ने सोहराई पेंटिंग से झारखंड की लोककला को दी नई पहचान।

HighLights

  1. हजारीबाग की महिलाएं सोहराई और कोहबर पेंटिंग को सहेज रही हैं।

  2. प्राकृतिक रंगों से बनी यह कला राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला रही है।

  3. जीआई टैग प्राप्त यह कला महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त कर रही है।

संवाद सूत्र, चरही (हजारीबाग)। झारखंड की समृद्ध लोककला और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में हजारीबाग की दर्जनों महिलाएं अहम भूमिका निभा रही हैं। मिट्टी की दीवारों पर सोहराई और कोहबर पेंटिंग बनाने वाली इन महिलाओं की कला गांवों से निकलकर महानगरों तक पहुंची है और उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।

दीपावली नजदीक आते ही ग्रामीण इलाकों में घरों की साफ-सफाई और सजावट शुरू हो गई है। हजारीबाग जिले के चुरचू समेत विभिन्न प्रखंडों के गांवों में मिट्टी के घरों की दीवारों पर रंग-बिरंगी कलाकृतियां बनाने की परंपरा कायम है।

बड़कागांव प्रखंड के जोराकाठ, गोंदलपुरा, सईदा और चपरी गांव की दर्जनों महिलाएं सोहराई और कोहबर पेंटिंग में विशेष दक्षता रखती हैं। दीपावली पर महिलाएं गोबर, काली मिट्टी, गेरुआ मिट्टी और दूधिया मिट्टी से दीवारों की पुताई करती हैं।

फिर उन पर पशु-पक्षियों, फूल-पत्तियों और पारंपरिक आकृतियों को उकेरती हैं। प्राकृतिक रंगों से बनी ये कलाकृतियां ग्रामीण जीवन, प्रकृति और आदिवासी संस्कृति की झलक दिखाती हैं। पक्के मकानों के बढ़ते चलन से मिट्टी की दीवारें और पारंपरिक चित्रकारी धीरे-धीरे कम हो रही हैं। हालांकि, कुछ परिवार इस विरासत को सहेजे हुए हैं।

पेंटिंग को नई पहचान देने के लिए शहरों में प्रदर्शनियां भी आयोजित की जाती हैं। महिलाओं की कोशिश है कि अगली पीढ़ियां इस लोककला से जुड़ी रहें और झारखंड की पहचान को देश-दुनिया में सम्मान मिले।

झारखंड की माटी की गंध और आदिवासियों की जीवन-दृष्टि

यह सिर्फ दीवारों पर उकेरे गए कुछ रंग नहीं हैं, बल्कि यह झारखंड की माटी की वह गंध और आदिवासियों की वह जीवन-दृष्टि है, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखती है। पक्के मकानों की ईंटें भले ही पारंपरिक दीवारों को कम कर रही हों, लेकिन इन महिलाओं के हाथों का हुनर इस प्राचीन परंपरा को कभी मिटने नहीं देगा।

GI टैग की प्रतिष्ठा: हजारीबाग की सोहराई और कोहबर कला को भौगोलिक संकेत (GI Tag) मिल चुका है, जो इस बात का प्रमाण है कि यह कला केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश की अमूल्य धरोहर है। इस बिंदु को जोड़ने से इस कला का राष्ट्रीय और वैश्विक महत्व और बढ़ जाता है।
प्राकृतिक रंगों का विज्ञान: रासायनिक रंगों के इस दौर में इन महिलाओं द्वारा प्राकृतिक तत्वों (जैसे गोबर, काली, गेरुआ और दूधिया मिट्टी) का उपयोग यह सिखाता है कि हमारी प्राचीन कला पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल (Eco-friendly) और टिकाऊ थी।

बदलते दौर में संघर्ष और संरक्षण

  • कैनवास और कपड़ों पर कला: पक्के मकानों के कारण मिट्टी की दीवारें कम हो रही हैं, लेकिन हजारीबाग की इन महिलाओं ने अपनी कला को केवल दीवारों तक सीमित नहीं रखा है। अब वे इसे कैनवास, साड़ियों, चादरों, जूट के थैलों और पेपर पर भी उतार रही हैं, जिससे इस कला को आधुनिक बाज़ार में एक नया जीवन मिल रहा है।
  • आर्थिक स्वावलंबन: यह कला केवल संस्कृति को सहेजने का जरिया नहीं है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण (Self-reliance) का भी बड़ा माध्यम बन रही है। प्रदर्शनियों और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म के जरिए इन्हें इनकी मेहनत का उचित मूल्य मिलने लगा है।

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