खेती की लागत कम करने और मिट्टी को उपजाऊ बनाए रखने के लिए अपनाएं ये तरीके, गुमला में 3000 किसानों को मिला प्रशिक्षण
गुमला में कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा 'खेत बचाओ अभियान' के तहत 3000 से अधिक किसानों को मृदा और जल संरक्षण ...और पढ़ें

3000 से अधिक किसानों को टिकाऊ कृषि पद्धतियों का प्रशिक्षण। जागरण
HighLights
3000 से अधिक किसानों को टिकाऊ कृषि पद्धतियों का प्रशिक्षण।
मिट्टी और जल संरक्षण, जैव विविधता बचाने पर जोर।
जागरण संवाददाता, गुमला। मिट्टी की सेहत बिगड़ेगी तो न केवल मानव व जीव जंतु का सेहत प्रभावित होगा बल्कि खेती की लागत भी बढ़ेगी, पर्यावरण प्रभावित होगा और किसानों की समृद्धि का रास्ता भी मुश्किल होगा। इसी चुनौती से निपटने के लिए भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे मिट्टी बचाओ अभियान को कृषि विज्ञान केंद्र, गुमला द्वारा सशक्त रुप से मूर्त रुप दिया जा रहा है।
खेत बचाओ अभियान को वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों से जोड़कर किसानों को जागरूक करने की पहल की जा रही है। अब तक 3000 से अधिक किसानों को मृदा संरक्षण और टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति प्रशिक्षित किया जा चुका है।
अभियान के तहत किसानों को केवल सैद्धांतिक जानकारी ही नहीं दी जा रही, बल्कि व्यवहारिक प्रयोगों के माध्यम से भी खेती के विभिन्न तरीकों का अंतर समझाया जा रहा है। रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से तैयार सब्जियों और प्राकृतिक तरीकों से उत्पादित सब्जियों के सड़ने, गलने और दुर्गंध आने की प्रक्रिया का प्रदर्शन कर किसानों को जानकारी दी जा रही है।
इसका उद्देश्य खाद्य उत्पादन के तरीकों, सब्जियों के संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व को समझाना है। हालांकि, सब्जियों के सड़ने की गति अकेले खेती की पद्धति से निर्धारित नहीं होती, बल्कि नमी, तापमान और भंडारण की स्थिति भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कृषकों को मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का संतुलित प्रयोग, जैविक खाद एवं हरी खाद का उपयोग, फसल चक्र अपनाने, दलहनी फसलों की खेती और फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन को बढ़ावा दिया जा रहा है। रासायनिक उर्वरकों का असंतुलित प्रयोग और मृदा अपरदन खेतों की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।
वहीं, फसल अवशेष जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है और मिट्टी के उपयोगी जैविक घटकों को नुकसान पहुंचता है। वर्षा जल संचयन और संरक्षण आधारित कृषि पद्धतियां इन समस्याओं को कम करने में सहायक हैं।
अभियान के तहत किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड, वैज्ञानिक प्रशिक्षण और तकनीकी परामर्श से जोड़ने पर भी जोर दिया जा रहा है। संतुलित पोषण प्रबंधन और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल खेती अपनाने से अनावश्यक लागत कम करने तथा उत्पादन को स्थिर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
अभियान का मूल संदेश है कि स्वस्थ मिट्टी, सुरक्षित पर्यावरण और समृद्ध किसान एक-दूसरे से जुड़े हैं। वैज्ञानिक तकनीकों और किसानों की सहभागिता से ही टिकाऊ खेती की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाए जा सकते हैं। प्रशिक्षण प्राप्त किसान संदीप भगत ने बताया कि मिट्टी के सेहत को बचाने की आवश्यकता है। जैविक खेती को अपनाकर उत्पादन में बढ़ोत्तरी की जा सकती है। इसके कई फायदे हैं।
क्या कहते हैं कृषि वैज्ञानिक?
रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के असंतुलित प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता और जैव विविधता प्रभावित हो रही है। इसी को देखते हुए भारत सरकार ने खेत बचाओ अभियान शुरू किया है। किसान इसमें रुचि लेकर वैज्ञानिक तरीके सीख रहे हैं और उन्हें खेती में अपनाकर टिकाऊ कृषि की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
-अटल बिहारी तिवारी, कृषि वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र गुमला।
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