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संयुक्त राष्ट्र में गूंजी झारखंड के लाल की आवाज, आदिवासी भाषाओं को मिली वैश्विक पहचान

Published: Sat, 01 Aug 2026 04:12 PM (IST)

डॉ. ए. बेंजामिन बाड़ा ने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय, जेनेवा में आदिवासी भाषाओं पर विशेष सत्र की सह-अध्यक्षता कर झारखंड और ...और पढ़ें

डॉ. ए. बेंजामिन बाड़ा। फोटो जागरण

डॉ. ए. बेंजामिन बाड़ा। फोटो जागरण

HighLights

  1. संयुक्त राष्ट्र में आदिवासी भाषाओं पर सत्र की सह-अध्यक्षता की।

  2. झारखंड और गुमला का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया।

  3. आदिवासी भाषाओं के संरक्षण हेतु वैश्विक मंच पर पैरवी की।

संवाद सूत्र, भरनो (गुमला)। गुमला जिले के भरनो प्रखंड के पंडरानी गांव निवासी डा. ए. बेंजामिन बाड़ा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर झारखंड और गुमला का नाम गौरवान्वित किया है।

स्विट्जरलैंड के जेनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित 19वें ईएमआरआईपी सत्र के दौरान उन्होंने आदिवासी भाषाओं पर आयोजित विशेष सत्र की सह-अध्यक्षता कर एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की।

डॉ. बाड़ा ने इस प्रतिष्ठित मंच पर दुनिया के विभिन्न देशों से आए प्रतिनिधियों के समक्ष आदिवासी भाषाओं, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने स्वदेशी समुदायों के भाषाई अधिकारों की प्रभावी पैरवी करते हुए झारखंड की समृद्ध आदिवासी सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर मजबूती से प्रस्तुत किया।

उनकी पहल को आदिवासी भाषाओं के संरक्षण और उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। डॉ. ए. बेंजामिन बाड़ा संयुक्त राष्ट्र के इस प्रतिष्ठित सत्र में आदिवासी भाषाओं पर आयोजित विशेष बैठक की सह-अध्यक्षता करने वाले पहले आदिवासी प्रतिनिधि बने हैं।

युवाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत

इसे वैश्विक स्तर पर आदिवासी समुदायों की भागीदारी और उनकी आवाज को मजबूत करने वाली ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे स्वदेशी भाषाओं के संरक्षण और उनके अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी।

डॉ. बाड़ा की इस उपलब्धि से भरनो, गुमला और पूरे झारखंड में खुशी का माहौल है। विभिन्न सामाजिक संगठनों, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों और जनप्रतिनिधियों ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि उनकी सफलता क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।

उनका यह सम्मान न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि पूरे आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान और भाषाई विरासत को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर भी है।

लोगों ने उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए कहा कि उनकी उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों को अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के लिए प्रेरित करेगी।

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