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'नेहरू भी हर 6 महीने में चाहते थे SIR', भाजपा सांसद निशिकांत दुबे का कांग्रेस पर हमला

Published: Fri, 25 Sep 2026 01:53 AM (IST)

देशभर में चल रहे SIR प्रक्रिया में अनियमितता के आरोपों के बीच भाजपा सांसद निशिकांत दुबे का बड़ा बयान सामने आया है।

सांसद निशिकांत दुबे। (एजेंसी)

सांसद निशिकांत दुबे। (एजेंसी)

HighLights

  1. 1951 चुनाव कानून में हर 6 महीने में SIR का प्रावधान।

  2. पंडित नेहरू भी SIR के पक्षधर थे, वित्तीय कमी से टला।

  3. कांग्रेस ने संवैधानिक संस्थाओं का राजनीतिक इस्तेमाल किया।

डिजिटल डेस्क, देवघर। देशभर में जारी विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर हो रहे विवाद और धांधली के आरोपों के बीच भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता व गोड्डा से सांसद निशिकांत दुबे ने बड़ा बयान दिया है।

कांग्रेस द्वारा लगाए जा रहे आरोपों का करारा जवाब देते हुए उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों और पूर्व चुनावी मिसालों का हवाला दिया।

नेहरू भी चाहते थे हर 6 महीने में हो SIR

निशिकांत दुबे ने स्पष्ट किया कि 1951 का निर्वाचन कानून खुद हर छह महीने में SIR कराने का प्रावधान करता है। उन्होंने कहा कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी इसी व्यवस्था के पक्षधर थे और इसे नियमित रूप से लागू करना चाहते थे।

वह हर 6 महीने में SIR करवाना चाहते थे। हालांकि, उस समय वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण इस प्रक्रिया को आगे के लिए टालना पड़ा था।

अधिकारियों का गिनाया नाम

चुनावी निष्पक्षता के मुद्दे पर विपक्ष को आड़े हाथों लेते हुए भाजपा सांसद ने आरोप लगाया कि कांग्रेस का इतिहास खुद संवैधानिक संस्थाओं के राजनीतिक इस्तेमाल का रहा है।

उन्होंने ऐसे कई पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों का जिक्र किया, जिन्होंने अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद कांग्रेस पार्टी का दामन थामा या सरकारी पद हासिल किए। उन्होंने कहा कि वी. एस. रमादेवी थी, निर्वाचन आयोग में सेवाएं देने के बाद उन्हें हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया।

एम. एस. गिल मुख्य चुनाव आयुक्त का पद छोड़ने के बाद कांग्रेस में शामिल हुए और केंद्र सरकार में मंत्री बने। टी. एन. शेषण: सेवानिवृत्ति के बाद कांग्रेस के टिकट पर गांधीनगर लोकसभा सीट से चुनाव लड़े।

कांग्रेस को कोई अधिकार नहीं

सांसद निशिकांत दुबे ने तंज कसते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी खुद इस तरह की परिपाटी की जन्मदाता और वाहक रही है, इसलिए उसे दूसरों पर उंगली उठाने का नैतिक अधिकार नहीं है।

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