प्रभात कुमार सिन्हा, गिरिडीह: दिन गुरुवार। सुबह सवा आठ बज रहे हैं, लेकिन अभी से ही सूरज की किरणें चुभने लगी हैं। गांव का हाल जानने के लिए बाइक से बेंगाबाद से चार किलोमीटर दूर घाघरा पहुंचा। यहां ग्रामीण सहदेव यादव से पूछ बासोकुरहा गांव की पकड़ ली।

गांव जाने के लिए पक्की सड़क बनाई जा रही है। गांव में चारों ओर चकाचक शौचालय हैं। एक जीर्ण-शीर्ण कुएं पर पानी भरने के लिए महिलाओं व बच्चों की भीड़ लगी थी। आगे गांव में एक पेड़ के नीचे दो-चार लोग बैठे हैं। बहादुर भोक्ता नामक ग्रामीण हाथों में कुल्हाड़ी लेकर खटिया बनाने के लिए लकड़ी छील रहे हैं। उनका कहना है कि मजदूरी ही उनका पेशा है। जंगल से पत्ता तोड़कर लाते हैं और पत्तल बेचकर घर-परिवार चलाते हैं।

गांव में सुविधाएं ढूंढ़ने पर निराशा हाथ लगेगी। एक स्कूल था, लेकिन उसे भी बंद कर दिया गया है। कुछ बच्चे स्कूल जाते हैं तो बाकी के सारे दिन में गांव में ही खेलते-कूदते दिख जाएंगे। स्थानीय बुंदिया देवी से समस्याएं जानने का प्रयास किया तो उन्होंने बताया कि स्कूल के पास ही एक चापाकल है, जहां से पीने का पानी लाते हैं, लेकिन वह भी गर्मी में सूख जाता है तो बगल के गांव तक जाना पड़ता है। जब पूछा कि गांव में किसी नेता को देखा है तो वह भड़क उठीं। बगल में बैठे विश्वनाथ भोक्ता का कहना है कि सरकार के पास से गांव के विकास के लिए योजना व राशि तो आती है, लेकिन वह गांव तक नहीं पहुंच सकी है। गांव के लोग आज भी पहले की ही तरह जिंदगी गुजार रहे हैं। खेती-बारी के लिए भी जमीन नहीं है। रोज कमाना-खाना, यही जिंदगी है।

मुखनी देवी कहती हैं कि चुनाव के समय बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, लेकिन उसके बाद यही जंगल हमारी जान बचाता है। बीमार पड़े तो भगवान ही एकमात्र सहारा हैं। गौरी देवी कहती हैं कि उन्हें कई साल पहले इंदिरा आवास मिला था, लेकिन आजतक वह पूरा नहीं बन सका। यहां तक कि गांव में एक भी आदमी को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ नहीं मिला है। गांव में छह परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन मिला है। जिदगी कादो-कीचड़ में बीत गई तो अब जाकर घाघरा पक्की सड़क के पास से गांव तक नई सड़क बनाई जा रही है।

गांव में और अंदर जाने पर शनिचर भोक्ता पत्तल सुखाते दिखे। बताया कि इससे पेट पालने भर कमाई हो जाती है। उनका कहना है कि सरकार व प्रशासन अगर ग्रामीणों को कौशल विकास के तहत प्रशिक्षित कर दे तो रोजगार के रूप में बेहतर तरीके से पत्तल उद्योग चलाया जा सकता है। रोजगार का यहां दूसरा कोई साधन भी नहीं है। महिलाओं बताती हैं कि जंगल पत्ता लाने जाते हैं तो कुछ महुआ भी चुन कर ले आते हैं, जिसे बाद में सुखा कर बेचते हैं तो अतिरिक्त आय हो जाती है।

गांव से करीब दो घंटे बाद लौटने के लिए अपनी गाड़ी वापस मोड़ी। थोड़ी दूर चलते ही बरगद के एक पेड़ में साड़ी का झूला बनाकर कुछ बच्चे चुनावी माहौल से बेफिक्र बचपन का आनंद उठाते दिखे। वहीं पेड़ की ओट में कुछ बच्चे बैठ अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। उनका कहना है कि गांव में जो स्कूल था, उसे सरकार ने बंद कर दिया है। अब उनका नाम दूसरे स्कूल में चला गया है। स्कूल गांव से दूर है, इसलिए रोज नहीं जा पाते। दिन चढ़ने के बाद स्कूल के सुनसान भवन के पास लगे चापाकल पर महिलाएं अपने रोजमर्रा के कामों को निपटाने के लिए भी जुट चुकी हैं। स्कूल के आगे भी इकट्ठे कई रंगीन शौचालय बने हुए हैं। इनका उपयोग ग्रामीण करते हैं। उम्मीद है कि मेरे बाद कोई जननेता भी यहां पहुंचे, असल में जिनकी बाट यहां के ग्रामीण जोह रहे हैं।

Posted By: Jagran

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