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दीपावली की आहट से घूमने लगे कुम्हारों के चाक, मिट्टी के दीये बनाने में जुटे परिवार

Published: Mon, 02 Nov 2026 11:52 AM (IST)

दीपावली नजदीक आते ही गढ़वा के कुम्हार परिवार दीये बनाने में जुट गए हैं, ताकि त्योहार पर अच्छी बिक्री हो ...और पढ़ें

गढ़वा के कुम्हार दीपावली के लिए दीये बनाने में व्यस्त। जागरण

गढ़वा के कुम्हार दीपावली के लिए दीये बनाने में व्यस्त। जागरण

HighLights

  1. गढ़वा के कुम्हार दीपावली के लिए दीये बनाने में व्यस्त।

  2. बारिश से दीये सुखाने और पकाने का काम प्रभावित।

जितेंद्र यादव, डंडई (गढ़वा)। दीपावली के पर्व में अब गिने-चुने दिन ही शेष रह गए हैं। त्योहार नजदीक आते ही कुम्हारों के चाक की रफ्तार तेज हो गई है। घर-आंगन से लेकर काम करने की जगहों तक मिट्टी के दीये और बर्तन बनाने की हलचल बढ़ गई है।

त्योहार पर अच्छी बिक्री की उम्मीद में कुम्हार समाज के लोग दूसरे काम छोड़कर पूरे परिवार के साथ दीये बनाने में जुट गए हैं। प्रखंड क्षेत्र के सुअरजंघा सहित रारो, लवाही और सोनेहरा गांवों में कई कुम्हार परिवार दीपावली के लिए दीये तैयार करने में लगे हुए हैं।

परिवार के पुरुष सदस्य चाक पर मिट्टी को आकार देकर दीये बना रहे हैं, जबकि महिलाएं और बच्चे तैयार दीयों को धूप में सुखाने और उन्हें व्यवस्थित करने में सहयोग कर रहे हैं। मिट्टी लाने, उसे गूंथने से लेकर दीये तैयार करने और पकाने तक का काम परिवार के लोग मिलकर कर रहे हैं।

कारीगरों की कोशिश है कि दीपावली से पहले पर्याप्त संख्या में दीये तैयार कर बाजार तक पहुंचाए जा सकें। हालांकि, पिछले दो दिनों में हुई बारिश से कुम्हारों की तैयारी कुछ प्रभावित हुई है।

बारिश के कारण मिट्टी के तैयार दीयों को धूप में सुखाने में परेशानी हुई है। इससे दीये पकाने का काम भी प्रभावित हुआ है। कुम्हारों का कहना है कि यदि मौसम साफ रहा और पर्याप्त धूप निकली तो दीपावली से पहले सभी दीये तैयार कर लिए जाएंगे। फिलहाल मौसम अनुकूल होने की उम्मीद में कारीगर तेजी से अपना काम पूरा करने में जुटे हैं।

सालभर की मेहनत पर त्योहार की बिक्री से टिकी रहती है उम्मीद

कुम्हारों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में लोगों की पसंद और त्योहार मनाने के तौर-तरीकों में काफी बदलाव आया है। पहले दीपावली पर घरों, आंगनों और दरवाजों पर मिट्टी के दीये जलाना परंपरा का अहम हिस्सा हुआ करता था। उस समय मिट्टी के दीयों के साथ-साथ अन्य बर्तनों की भी अच्छी मांग रहती थी।

त्योहार के दौरान होने वाली बिक्री से परिवारों को अच्छी आमदनी होती थी और उनकी सालभर की मेहनत का फल मिल जाता था। लेकिन अब लोग मोमबत्तियों और रंग-बिरंगी इलेक्ट्रिक लाइटों से घरों को सजाने लगे हैं। इससे मिट्टी के दीयों की मांग और कुम्हारों की कमाई प्रभावित हुई है।

कुम्हारों के अनुसार, इलेक्ट्रिक लाइटों और मोमबत्तियों का चलन बढ़ने के बावजूद मिट्टी के दीयों की अपनी अलग पहचान और धार्मिक महत्ता है। दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा आज भी कायम है।

पहले दीपावली में मिट्टी के दीयों की खूब बिक्री होती थी। लोग घरों में मिट्टी के दीये ही जलाते थे। अब बिजली वाली झालरों का चलन बढ़ गया है, जिससे बिक्री पहले जैसी नहीं रही। फिर भी मिट्टी के दीयों की अपनी अलग पहचान और धार्मिक महत्व है।

-जगदेव प्रजापति, सुअरजंघा

Jagdev Prajapati Garhwa

दो दिनों की बारिश से दीये सुखाने में परेशानी हुई है। मिट्टी के तैयार दीयों को धूप नहीं मिल सका। अगर मौसम साफ रहा और पर्याप्त धूप निकली, तो दीपावली से पहले सभी दीये तैयार कर लिए जाएंगे।

-राजेश्वर प्रजापति

Rajeshwar Prajapati Garhwa

दीपावली हमारे परिवार के लिए साल का सबसे महत्वपूर्ण अवसर है। परिवार के सभी सदस्य कई दिन पहले से दीये बनाने की तैयारी में जुट जाते हैं। त्योहार में अच्छी बिक्री होने से परिवार की जरूरतें पूरी करने में मदद मिलती है, लेकिन बढ़ती लागत के कारण मुनाफा कमाना मुश्किल हो गया।

-प्यारी प्रजापति

Pyari Prajapati Garhwa

दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा आज भी बनी हुई है। हमारे घर के बड़े-बुजुर्ग दीये बनाने का काम करते हैं और हम युवा भी इसमें हाथ बंटाते हैं। हालांकि बाजार में बिजली की झालरों और चाइनीज लाइटों का चलन बढ़ने से मिट्टी के दीयों की मांग पहले जैसी नहीं रही।

-संतोष प्रजापति, सुअरजंघा। 

Santosh Prajapati Garhwa

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