जागरण संवाददाता, दुमका : पाकुड़ के एसपी अमरजीत बलिहार और पांच जवानों की हत्या के मामले में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश तौफीकुल हसन की विशेष अदालत ने बुधवार को नक्सली प्रवीर दा उर्फ सुखलाल मुर्मू और सनातन बास्की उर्फ ताला दा को फांसी की सजा सुनाई। 02 जुलाई 2013 को यह सनसनीखेज वारदात हुई थी। अदालत ने 63 पन्नों में अपना फैसला सुनाया। अभियुक्तों को ¨हदी में फैसला सुनाया गया। दोनों के अधिवक्ता अदालत के इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करेंगे।

इससे पूर्व कोर्ट परिसर में सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त के बीच दोनों को पौने एक बजे अदालत में पेश किया गया। बचाव पक्ष के अधिवक्ता राजा खान और केएन गोस्वामी दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने फैसला ढाई बजे तक के लिए टाल दिया। दो बजे दोनों नक्सलियों को अदालत में पेश किया गया। बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने कहा कि सरकार ने पुनर्वास नीति तैयार की है। दोनों की सजा को कम किया जाता तो उनके भविष्य के लिए अच्छा होगा। सहायक लोक अभियोजक सुरेंद्र प्रसाद ¨सह ने कहा कि दोनों ने जघन्य हत्या की है। इसलिए फांसी से कम सजा नहीं होनी चाहिए। जज ने तीन बजे अपना फैसला सुनाया।

¨हदी में सुनाया फैसले का मुख्य बिंदु:

जज ने पहले दोनों अभियुक्तों से पूछा कि उन्हें अंग्रेजी आती है या नहीं। दोनों के इन्कार करने पर जज ने कहा कि 63 पन्नों का फैसला ¨हदी में बताने में समय लगेगा। इसलिए मुख्य ¨बदु ¨हदी में सुना रहे हैं। दोनों को एक पुलिस पदाधिकारी व जवानों की हत्या, हथियार लूटने, घटना की साजिश रचने करने के आरोप में फांसी की सजा सुनायी जाती है। दोनों को तब तक फंदे पर लटकाया जाए, जब तक जान नहीं निकल जाए। फैसला सुनाने के बाद पुलिस कड़ी सुरक्षा में दोनों को केंद्रीय जेल ले गई।

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क्या है पूरा मामला

दो जुलाई 13 को डीआइजी प्रिया दुबे ने दुमका में प्रमंडल के सभी छह जिले के पुलिस अधीक्षक की बैठक बुलायी थी। पाकुड़ के एसपी अमरजीत बलिहार बैठक में शामिल हुए थे। बैठक के बाद वे पाकुड़ लौट रहे थे। जब उनकी गाड़ी काठीकुंड के आमतल्ला गांव के पास जंगल से गुजर रही थी। तब पहले से घात लगाकर बैठे नक्सलियों ने हमला किया। एके 47, इंसास और एसएलआर से ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं। पुलिस की ओर से जवाबी फाय¨रग की गई। इस घटना में एसपी के अलावा पांच जवान दुमका के गुहियाजोरी निवासी मनोज हेम्ब्रम, साहिबगंज के राजीव कुमार शर्मा, संतोष मंडल, बिहार बक्सर के अशोक कुमार श्रीवास्तव व बिहार के कटिहार निवासी चंदन थापा शहीद हो गए। हत्या के बाद नक्सली दो एके 47 रायफल, चार इंसास, पिस्टल के अलावा 647 गोलियां लेकर भाग गए। पुलिस ने प्रवीर दा समेत सात नक्सलियों को मुख्य आरोपित बनाया था। छह सितंबर को अदालत ने हत्याकांड में शामिल हार्डकोर नक्सली वकील हेम्ब्रम, लोबिन मुर्मू, सतन बेसरा, मानवेल मुर्मू और मानवेल मुर्मू द्वितीय को साक्ष्य के अभाव में संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया था। गिरफ्तार सात आरोपितों का न्यायालय में ट्रायल हुआ। इसके बाद अदालत ने फैसला सुनाया।

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21 साल पहले सुनाई थी फांसी की सजा :

इससे पहले दुमका में 21 साल पहले 1997 में जामा प्रखंड कार्यालय के एक कर्मचारी को दुधानी के एक बच्चे समेत दो की हत्या के आरोप में तत्कालीन जिला जज हरिशंकर प्रसाद की अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी। उनके अधिवक्ता ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। वहां से उसे हत्या के आरोप में बरी किया गया था।

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न्यायालय परिसर में थी प्रवीर की पत्नी :

अदालत का फैसला सुनने के लिए प्रदीर दा की पत्नी नमिता राय सुबह दस बजे कोर्ट परिसर पहुंच गई थी। हालांकि सुनवाई के दौरान वह न्यायालय कक्ष में नहीं गई। बाहर खड़े होकर फैसले का इंतजार करती रही। नमिता का कहना था कि अदालत से इस तरह के फैसले की उम्मीद नहीं थी। अब उच्च न्यायालय जाएंगे।

Posted By: Jagran

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