देशी शराब बेचने वाली महिला बनी बदलाव की 'सरिता', दुमका में 36 से अधिक महिलाओं की सवांरी जिंदगी
दुमका की सरिता मरांडी ने अवैध शराब के धंधे को छोड़कर सब्जी और फास्ट फूड का व्यवसाय शुरू किया, जिससे उनकी मासिक आय 25 हजार से अधिक हो गई।

दुमका की सरिता मरांडी। (जागरण)
HighLights
सरिता मरांडी ने अवैध शराब का धंधा छोड़कर आत्मनिर्भरता पाई।
झारखंड के दुमका में सब्जी और फास्ट फूड व्यवसाय से सफल।
अन्य महिलाओं को भी सम्मानजनक आजीविका अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं।
जागरण संवाददाता, दुमका। दुमका के सरैयाहाट प्रखंड में एक गांव है महादेवगढ़। इस गांव की एक आदिवासी महिला ने अपने दम पर न सिर्फ अपनी पहचान बनाई बल्कि महादेव एवं आसपास के कई गांवों की किशोरियां व युवतियों के लिए सरिता बनकर इन्हें तरक्की की राह दिखा रही है।
इसे एक इत्तफाक भी कहें कि महादेवगढ़ की इस महिला का नाम भी सरिता ही है। सरिता मरांडी की कहानी केवल एक महिला की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि उस परिवर्तन की कहानी है, जिसने एक परिवार को नई पहचान दी और समाज की अनेक महिलाओं में आशा की नई किरण है।
सरिता बताती है कि कुछ वर्ष पहले तक उसका जीवन संघर्षों से भरा था। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय थी। रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए उसके पास कोई स्थायी आय का स्रोत नहीं था।
परिस्थितियों फंसी वह छह वर्षों तक देशी शराब बनाने और बेचने का कार्य करने को विवश रही। वह कहती है कि यह काम उसकी मजबूरी थी लेकिन मन में हमेशा एक सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन जीने की इच्छा थी।
बताती है कि जीवन में परिवर्तन का निर्णायक मोड़ तब आया जब वह झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसायटी के फूलो झानो आशीर्वाद अभियान से जुड़ी।
इस अभियान के माध्यम से उसे आर्थिक सहायता के साथ आत्मविश्वास भी मिली। वह एक नई सोच के साथ द नज इंस्टीट्यूट के सतत मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और प्रेरणा से आगे बढ़ना शुरू की।
सरिता ने कहा कि इस अभियान से जुड़ने पर उसे 50,000 रुपये का ब्याज-मुक्त आजीविका ऋण उपलब्ध कराया गया था।
इसका उसने भरपूर लाभ उठाया। सबसे पहले इस पैसे से व्यावसायिक स्तर पर सब्जी की खेती शुरू की। खेतों में मेहनत रंग लाई और खेती से अच्छी आय होने लगी।
इसके बाद उन्होंने अपने गांव में फास्ट फूड की व्यवसाय की शुरुआत की। इससे भी आय के नए स्रोत बने। व्यवसाय को और मजबूत करने के लिए एक टोटो वाहन भी खरीदा।
सरिता कहती है कि आज के दिन उसे इन उद्यमों से प्रतिमाह लगभग 25 हजार रुपये से अधिक की नियमित आय हो रही है।
इस आय की वजह से परिवार का रहन-सहन बदल गया। बच्चों की शिक्षा पर बेहतर ढंग से खर्च कर पा रही है। परिवार की आवश्यकताओं को ठाट से पूरा कर रही हैं। इतना ही नहीं भविष्य के लिए आत्मविश्वास के साथ योजनाएं भी बना रही है।
नव जीवन कैडर बनकर गांव की महिलाओं की बनीं संबल
अपनी आर्थिक मजबूती ही सरिता की उपलब्धि नहीं है बल्कि वह वर्ष 2025 के अक्टूबर माह से नव जीवन सखी कैडर बनकर गांव की महिलाओं के लिए संबल है।
वह गांव-गांव जाकर उन महिलाओं से मिलती है जो आज भी देशी शराब बनाने और बेचने के कार्य से जुड़ी हुई हैं। इनके बीच वह अपने जीवन के अनुभवों को साझा करते हुए वह उन्हें समझाती हैं कि यदि वह चाहें तो सम्मानजनक और स्थायी आजीविका के माध्यम से अपने जीवन को नई दिशा दे सकती हैं।
महिलाओं के बीच सरिता किसी किताब से सीखी हुई बातें नहीं बताती बल्कि अपना जीवन सामने रखती है। जब वह कहती है कि मैंने बदलाव किया है, इसलिए आप भी कर सकती हैं, तो उसके शब्दों में आत्मविश्वास की शक्ति होती है।
यही कारण है कि उसकी बातें महिलाओं को बदलने में असरदार साबित हुई है। महादेवगढ़ व आसपास के गांवों की तकरीबन तीन दर्जन से अधिक महिलाएं सरिता से प्रेरित होकर देशी शराब के कारोबार को छोड़ कर वैकल्पिक आजीविका की ओर कदम बढ़ा चुकी है।
सरिता कहती है कि पहले वह अकेली थी लेकिन अब कई उसके साथी हैं जो बदलाव की बयार में सशक्त हो रही हैं।
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महिला सशक्तिकरण केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है। वास्तविक सशक्तिकरण तब होता है, जब एक महिला आत्मविश्वास के साथ अपने पैरों पर खड़ी होती है और फिर अपने साथ दूसरों को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। सबसे बड़ी सफलता अधिक पैसा कमाना नहीं है, बल्कि किसी दूसरी महिला के भीतर अपने जीवन को बदलने का विश्वास जगाना है।
