राजीव रंजन, दुमका। कभी यूरोप के रईसों की शाही पसंद रहा सैंडविच आज देश के छोटे शहरों और गांवों की गलियों तक के फास्ट फूड कल्चर का हिस्सा बन चुका है।
ब्रेड के दो स्लाइस के बीच सब्जी, मसालों और सॉस की परतें भले ही देखने में साधारण लगें, लेकिन इसका स्वाद युवाओं की जुबान पर चढ़कर बोल रहा है।
स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों से लेकर नौकरीपेशा वर्ग तक, हर कोई इसका दीवाना है। खास बात यह है कि सैंडविच के स्टॉल हर वर्ग के बजट का पूरा ख्याल रखते हैं, जिससे यह हर आम और खास की पहुंच में है।
यूरोप के रईसों की पसंद से लेकर छोटे शहरों का फास्ट फूड
सैंडविच का इतिहास लगभग 18वीं सदी के इंग्लैंड से जुड़ा है। इसकी लोकप्रिय कहानी ब्रिटिश राजनीतिज्ञ जॉन मोंटेग्यू से जुड़ी है, जो चौथे अर्ल ऑफ सैंडविच थे।
वर्ष 1762 के आसपास ताश खेलने के दौरान उन्हें ऐसा भोजन चाहिए था जिसे हाथ में पकड़कर आसानी से खाया जा सके और खेल में भी रुकावट न आए।
तब उन्हें रोटी के दो टुकड़ों के बीच मांस रखकर परोसा गया, जिसे बाद में उनके नाम पर 'सैंडविच' कहा जाने लगा।
समय के साथ यह वैश्विक व्यंजन भारत भी पहुंचा और अब इसकी धूम महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक है। हालांकि, ब्रेड के बीच खाद्य सामग्री भरकर खाने की यह परिकल्पना भले ही विदेशी हो, लेकिन भारत और झारखंड की अपनी पारंपरिक खानपान शैली भी कम समृद्ध नहीं है।
झारखंड के दुमका में मिलने वाला 'पतड़ा पीठा' इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है, जिसे आज की 'जेन-जी' पीढ़ी प्यार से 'झारखंडी पिज्जा' भी कहती है।
दुमका के बाजार में स्वाद और वैरायटी की धूम
दुमका के स्थानीय बाजारों में सैंडविच की बढ़ती लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां सामान्य ब्रेड सैंडविच से लेकर ग्रिल्ड, वेज, पनीर और चीज सैंडविच तक की भारी डिमांड है।
शहर के विभिन्न फास्ट फूड स्टॉल और कैफे में इसे आधुनिक अंदाज और आकर्षक फ्लेवर में तैयार किया जा रहा है। मेयोनीज़, टोमैटो सॉस, चिली सॉस और विशेष मसालों का मेल इसे एक नया और बेहतरीन जायका दे रहा है।
छोटे कारोबारियों के लिए रोजगार का बड़ा जरिया
सैंडविच की लगातार बढ़ती मांग ने स्थानीय स्तर पर छोटे कारोबारियों और युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए द्वार खोले हैं।
कम लागत, सीमित जगह और आसानी से उपलब्ध होने वाली सामग्रियां (जैसे ब्रेड, सब्जियां, मक्खन और पनीर) इस बिजनेस को बेहद सुविधाजनक बनाती हैं।
दुमका के जामा मस्जिद के पास स्टॉल लगाने वाले एक दुकानदार बताते हैं कि उनके काउंटर पर वेज और नॉन-वेज दोनों तरह के सैंडविच की जबरदस्त मांग रहती है।
ग्राहक अब केवल स्वाद ही नहीं, बल्कि साफ-सफाई और बेहतरीन क्वालिटी को भी प्राथमिकता देते हैं, जिसका दुकानदार पूरा ध्यान रख रहे हैं।
संतालों का पारंपरिक 'पतड़ा पीठा' अब जोमैटो पर भी उपलब्ध
चावल के आटे और लजीज भरावन से तैयार 'पतड़ा पीठा' आदिवासी समुदाय का एक खास पारंपरिक व्यंजन है। ग्रामीण और शहरी महिलाओं ने इसे आधुनिक अंदाज में पेश कर एक मजबूत ब्रांड बना दिया है।
साल के पत्तों में ढंककर खास विधि से पकाया जाने वाला यह पीठा दुमका के ऐतिहासिक हिजला मेले (जो ब्रिटिश काल से यानी लगभग 135 वर्षों से लग रहा है) की शान बन चुका है।
आज यह व्यंजन केवल मेलों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई फूड स्टॉल्स पर आदिवासी समुदाय के महिला व पुरुष इसे बड़े चाव से बेच रहे हैं।
इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह अब ऑनलाइन फूड डिलीवरी ऐप जोमैटो पर भी उपलब्ध है, जहां इसके 20 पीस की कीमत 280 रुपये और 12 पीस की कीमत 200 रुपये है।