धनबाद [ रोहित कर्ण ]। इंटक के राष्ट्रीय महामंत्री राजेंद्र सिंह अब नहीं रहे। उनके निधन ने झारखंड के नेताओं के लिए कई चुनौतियां खड़ी कर दी है। वे नेशनल माइन वर्कर्स फेडरेशन, राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ व झारखंड इंटक के भी अध्यक्ष थे। अब झारखंड इंटक के नेता भी यह नहीं मानते कि किसी एक नेता को यह चारों पद मिलेगा। अलग-अलग पद के लिए सेटिंग-गेटिंग अंदरखाने शुरू भी हो गई है। हालांकि जो सबसे बड़ा सवाल है वह यह कि अब बाबा क्या करेंगे। राजेंद्र सिंह को अनन्य मित्र कहने के बावजूद उनसे अलग उन्होंने समानांतर इंटक का गठन कर लिया था, जिसके अध्यक्ष भी वही थे। अब जबकि प्रतिद्वंद्वी ही नहीं रहे जंग किससे हो? यह जरूर है कि अलग संगठन नहीं होता तो आज वे निर्विवाद दावेदार होते। बहरहाल झारखंड की बागडोर दिवंगत के पुत्र को देने की चर्चा शुरू हो चुकी है। फिलहाल वे कार्यकारी हैं।


खुला पिटारा निकला जीरो

जिले के हार्डकोक व्यवसायियों के लिए फिलहाल स्थिति कुछ ऐसी ही है। कोयला मंत्री ने जैसे ही ट्वीट किया कि नॉन रेगुलेटेड सेक्टर के लिए लिंकेज 30 वर्ष तक बढ़ा दिया गया है, हार्डकोक व्यवसायी झूम उठे। वह इसी श्रेणी में आते हैैं। हालांकि अगले ही दिन उनकी खुशी काफूर हो गई। वजह कोल इंडिया से बीसीसीएल तक ने कह दिया कि हमें कोई जानकारी नहीं दी गई है। अब लोग कहने लगे कि नॉन रेगुलेटेड सेक्टर में स्टील भी आता है जिसे लिंकेज का कोयला मिल रहा है। यह लिंकेज ऐसे ही सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के लिए है न कि निजी हार्डकोक कारोबारियों के लिए। समयसीमा उनके लिए बढ़ाई जाती है, जिन्हें सुविधा दी जा रही हो, उनके लिए नहीं जिनकी खत्म कर दी गई हो। यूं भी आधी कीमत पर कोयला खरीद उसे पूरी कीमत में अवैध तरीके से बेचने की शोर ऊपर तक है।

निकल गई हेकड़ी
कोरोना ने अच्छे अच्छों की हेकड़ी निकाल दी। अब बीसीसीएल को ही देखिए। तीन-चार महीने पहले क्या निजी, क्या सार्वजनिक कंपनी। सभी को एक ही तराजू से तौल रही थी। सेल को भी बता दिया कि हमसे कोयला लेना है तो कायदे से कतार में आइए। ऑक्शन में भाग लीजिए और कोयला लीजिए। वह भी तब जबकि सेल के साथ उसका एमओयू था। अब जबकि कोई खरीदार पूछ नहीं रहा तो यह खुशामद पर कोयला उपलब्ध करा रहा है। बिना किसी ऑक्शन के स्वयं आगे बढ़कर इसने सेल के चासनाला वाशरी को कोयला उपलब्ध कराना शुरू किया है। वह भी मनचाही खदानों से। सेल के सीजीएम अनिल राय बताते हैैं कि ऑक्शन में भाग लेने को मंत्रालय से अनुमति लेना पड़ता। फिलहाल बिना किसी ऑक्शन के तीन हजार टन कोयला भौैंरा, कनकनी कोलियरियों से प्रतिदिन दिया जा रहा है। चलिए इसी बहाने वोकल फॉर लोकल तो हुआ।

ऐसी गुणवत्ता से तौबा
कोयले की गुणवत्ता को लेकर बीसीसीएल पर कई बार सवाल उठते रहे हैैं। हाल के दिनों में पावर कंपनियों ने तो कई क्षेत्रों से कोयला न देने तक का आग्रह कर दिया था। इससे निजात पाने को कंपनी ने साइडिंग पर डोजर का इस्तेमाल बंद कर दिया था। कोल हैैंडलिंग प्लांट लगवाए गए थे। हाल के दिनों में हुई बैठकों में अधिकारियों को गुणवत्ता सुधारने की सख्त हिदायत भी दी गई थी। इन सारी कवायदों पर कंपनी ने खुद पलीता लगा दिया। रेल और रोड सेल के लिए ऑफर देते समय आरओएम कोयला ही देने की शर्त लगा दी। बोले तो खदान से उठाकर सीधे आपूर्ति की बात कारोबारियों के गले नहीं उतरी। गुणवत्ता सुधारने की सारी बात हवा हो गई। सो कारोबारियों ने भी तौबा कर लिया और एक लाख टन के करीब कोयले को कोई खरीदार न मिला। सस्ती दर भी न लुभा पाई।

 

Posted By: Mritunjay

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