धनबाद, जेएनएन। आम चुनाव यानी लोकसभा चुनाव। भारतीय लोकतंत्र में इससे बड़ा कोई त्योहार नहीं। चूंकि सामान्य पर्व-त्योहार चाहे किसी भी धर्म-संप्रदाय के हों, साल में एक बार आता ही है। आम चुनाव के साथ ऐसा नहीं है। यह पूरे पांच साल इंतजार के बाद आता है। वैसे, मध्यावधि चुनाव अपवाद है। इसलिए सबको बेसब्री से इंतजार रहता है। खासकर पार्टी के आम कार्यकर्ताओं को। यही अवसर होता है जब थोड़ी-बहुत आवभगत होती है। सांसद बनने के बाद कौन पूछता है? कार्यकर्ताओं को दुत्कार ही मिलता है।

धन की नगरी के कार्यकर्ताओं को बड़ी उम्मीद थी। अबकी फाइट टाइट होगा। लड्डू से लड्डू लड़ेगा तो बुंदिया झड़ेगा! यह क्या? खिलाड़ी की एंट्री ने तमाम आशाओं पर तुषारापात कर दिया है। सब मानकर चल रहे थे कि माहौल बनाने के लिए विटामिन एम का खेल खेलेंगे। कार्यकर्ता दूर-दूर से सुबह-सुबह ही कार्यालय में पहुंच जाते हैं। शाम तक खिलाड़ी का इंतजार करते हैं। जब सामना होता है तो विटामिन एम के बजाय नसीहत मिलती है। यहां क्या कर रहे हैं.. फील्ड में जाइए... वगैरह-वगैरह। मजबूरी में मुंह लटका कर लौट जाते हैं। इससे माहौल बनने के बजाय बिगड़ रहा है।

खिलाड़ी की बात भाईजी तक भी पहुंच रही है। खिलाड़ी के पल-पल के दांव की खबर पहुंच रही है। नतीजतन, वह भी निश्चिंत हैं। हाथ नहीं खोल रहे हैं। इससे उनके खेमे के कार्यकर्तारूपी फौज में भी घटाटोप निराशा बढ़ रही है। ऐसा नहीं है कि पार्टी ने व्यवस्था नहीं की है। पंचायत स्तर से लेकर प्रदेश स्तर के नेता और कार्यकर्ता की व्यवस्था की गई है। नामांकन से पहले, नामांकन के बाद, प्रतिदिन का प्रचार और बूथ मैनेजमेंट के लिए यानी स्टेप बाई स्टेप निर्धारित टॉपअप की व्यवस्था है। पड़ोस के क्षेत्रों में टॉपअप से कार्यकर्ता चार्ज भी होने लगे हैं। यहां दोनों तरफ सूखा पड़ा है। कार्यकर्ता अपने भाग्य को कोष रहे हैं।

काल का पहिया घूम गया भइयाः कहते हैं न दुनिया गोल है। न जाने कब, कहां और किस मोड़ पर मुलाकात हो जाय कहा नहीं जा सकता है। अब कोयलांचल की चुनावी राजनीति को ही लीजिए। तीन दशक पहले चले माफिया ट्रायल को लोग आज भी याद करते हैं। जिसने माफिया ट्रायल चलाया उनके राजनीतिक वारिश अपनी नई राजनीतिक पारी शुरू करने के लिए कोयलांचल की पिच पर खड़े हैं। आश्चर्यजनक यह कि उन्होंने अपना कैंप कार्यालय और वार रूम जिस बंगले में बनाया है वह भी माफिया ट्रायल की जद में था। तीन-तीन केंद्रीय एजेंसियों का छापा पड़ा था। गुंडा एक्ट के तहत कार्रवाई हुई थी। आज जो सारथी बने फिर रहे हैं उनके पिताजी भी जेल में डाल दिए गए थे। अब देखिए काल का पहिया घूम कर कहां खड़ा है। नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की लड़ाई को भूलकर राजनीति की नई इबारत लिख रही है।

रिश्वत पर नहीं आचार संहिताः जब से आम चुनाव की घोषणा हुई है चहुंओर आचार संहिता का शोर और डर है। असैनिक अधिकारी भी सैन्य अधिकारी की तरह पेश आ रहे हैं। जरा भी प्रैक्टिकल नहीं हो रहे हैं। बात-बात पर डंडा चला रहे हैं। शादी-ब्याह से लेकर पूजा-पाठ पर भी लाठियां भांज रहे हैं। इससे लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। जबकि यह सब कोई बड़ी बात नहीं है। अधिकारी सिर्फ व्यवहारिक हों तो जनता का दिल जीत सकते हैं। चुनाव से जुड़े मामलों में सख्ती से आचार संहिता लागू करें, कौन सवाल उठाएगा? अधिकारियों के व्यवहारिक नहीं होने के कारण सवाल भी उठने लगे हैं। कई अधिकारी तो चुनावी शोर में जमकर भ्रष्टाचार कर रहे हैं। सोच यह कि सबका ध्यान चुनाव पर उनके भ्रष्टाचार पर किसी का ध्यान नहीं जाएगा। ऐसे ही सोच वाले एक साहब ने 70 हजार रुपये का भ्रष्टाचार किया है। वृद्ध की जमीन पर कब्जा करने के लिए दबंगों को लाइसेंस दे दिया है। विरोध करने पर वृद्ध को धमका रहे हैं। ऑफिस तो ऑफिस घर में भी बुलाकर वृद्ध को प्रताडि़त कर रहे हैं। चुनाव आयोग कार्रवाई करेगा? इंतजार कीजिए।

Posted By: mritunjay

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