मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

धनबाद, जेएनएन। झरिया कोयलाचल ने आजादी की लड़ाई में अपनी सार्थक भूमिका निभायी है, यह तो सर्वविदित है। उन दिनों आजादी के दीवानों की हर गतिविधि पर अंग्रेजी हुकूमत की पैनी नजर होती थी। ऐसे स्थान गिने-चुने होते थे, जहा बैठकर एक साथ आजादी के रणबाकुरे कोई योजना बना सकें। खाने का होटल, चाय दुकान, पान दुकान आदि पर तो प्रशासन कुछ ज्यादा ही कड़ी नजर रखता था। इन दुकानों के संचालक भी डर से या चंद पैसों के लोभ में देश के वीर बहादुरों की प्लानिंग पुलिस-प्रशासन के पास 'लीक' कर दिया करते थे। लेकिन ऐसे 'जयचंदों' के बीच झरिया में एक मगन भाई थे जो न केवल खुद देश की आजादी के तलबगार थे, बल्कि स्वतंत्रता के सिपाहियों के हितरक्षक एवं गुणग्राहक भी।

झरिया मेन रोड के पश्चिमी किनारे देशबन्धु सिनेमा के पास एक सौ साल पुराना होटल हुआ करता था। यह तीन-चार बर्ष पहले बंद हो गया और उसके स्थान पर दूसरी दुकान खुल गयी है। यह सौ-साला होटल नगर और आस-पास के इलाके में रहने वाले विशिष्टजनों का, खासकर राजनीतिक नेताओं, डॉक्टरों, शिक्षकों, समाजसेवियों, पत्रकारों, साहित्यकारों, कोयला उद्योग से जुड़े व्यक्तित्वों एवं जिज्ञासु बुद्धिजीवियों का एक खुला सार्वजिनक मंच था। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ से यह होटल नगर की बौद्धिक गतिविधियों का साक्षी रहा। इसे यहा का 'कॉफी हाउस' कहा जाता था। दरअसल, कॉफी हाउस कलकत्ता में प्रेसिडेंसी कॉलेज के सामने स्थित कॉलेज स्ट्रीट में है, जो 1876 में स्थापित हुआ था। गुलामी के दिनों में इसकी प्रसिद्धि छात्रों एवं बुद्धिजीवियों के मिलन स्थल या अड्डा के रूप में हुई। इस कॉफी हाउस ने देश को कई मशहूर शख्सीयतें दी। असल में, कोलकाता का कॉफी हाउस पेरिस स्थित उसी कॉफी हाउस का प्रतिरूप रहा, जिसकी स्थापना 15वीं शताब्दी में हुई और उसने बुद्धिजीवियों के लिए उर्वर भूमि के रूप में काम किया। फ्रासीसी क्राति में भी इस कॉफी हाउस की महती भूमिका रही।

'मगन होटल' को यह नाम स्वत: मिला अपने मालिक मगन भाई जानी के कारण और ऐतिहासिक गरिमा मिली बुद्धिजीवी ग्राहकों के कारण। इस होटल के खुलने की भी एक मनोरंजक कथा है। झरिया में कोयला उद्योग (सन् 1890 ई. के आस-पास) परवान चढ़ा तो उद्योग-व्यापार से आकर्षित हो अन्य राज्यों गुजरात, पंजाब, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश आदि के लोग आने लगे। गुजरात से आये लोगों में जहा उद्योगपति वोरा-चनचनी जैसे घराने थे, वहीं उनको सहयोग करने के लिए पंडित-पुजारी, मुंशी और मैनेजर जैसे लोग भी आये। उसी दौर में सन् 1900 ई. के आस-पास, गुजरात के जिला सुरेन्द्रनगर के हरबद गाव के कुछ पंडित उद्धव भाई जानी एवं छोटेलाल जानी जैसे लोग भी आये। उद्भव भाई, स्टेशन रोड स्थित सत्यनारायण मंदिर में अल्पकालीन पूजा-पाठ करते थे और खाली समय में गुजराती मुहल्ला-फतेहपुर के निवासियों के बीच पेड़ा, चिउड़ा, गठिया-भुजिया आदि घूम-घूमकर बेचते थे। उन परिवारों के लोगों को अपने 'देस' की खाद्य सामग्री तथा जलपान का स्वाद सहज ही मिलने लगा। दूसरी ओर छोटेलाल जानी, कोयला व्यापार में परामर्श देने और सामाजिक कायरें में भाग लेने में व्यस्त हो गये। उनकी लोकप्रियता का ही प्रतिफल है कि आज के कतरास मोड़ से लेकर झरिया स्टेशन रोड- बालूगद्दा तक का मेन रोड, छोटेलाल जानी रोड के नाम से जाना गया।

उद्भव भाई का गुजराती जलपान वाला व्यवसाय चल निकला तो उन्होंने गाव से अपने तीनों बेटों- बाबूभाई, मनसुख और मगनलाल को भी झरिया बुला लिया और फतेहपुर मुहल्ले में फरसान (गुजराती नाश्ता) की एक स्थायी दुकान खोली। उसी दुकान में ट्रेनिंग पाकर उद्धव भाई के सबसे छोटे बेटे मगनलाल ने मेन रोड में एक छोटी गुमटी लगायी। मगन की कर्मठता, चुस्ती-फुर्ती, मिलनसार स्वभाव एवं हंसमुख चेहरा, ग्राहकों को स्वत: अपनी ओर खंींच लेता था। आश्चर्य की बात है कि एक किशोरवय बालक मगन की चाय दुकान, बरास्ते कच्छी चाय दुकान, लगभग दस वषरें में प्रसिद्ध 'मगन होटल' के नाम से विख्यात हो गया। धीरे-धीरे मगन भाई ने अपनी दुकान का विस्तार किया। सामने फुटपाथ पर कुछ बेंचें लगा दी। बाद में, लोहा-लकड़ी की बनी आरामदेह बेंचों की कतार आमने-सामने लगा दी। 1920 ई. के आते-आते उन बेंचों का अपना विशिष्ट महत्व हो गया। नगर की प्रमुख विभूतिया और स्वतंत्रता-प्रेमी नौजवानों का आपसी विचार-विमर्श करने का प्रमुख स्थान बन गया- मगन होटल। इस होटल में बैठने वालों में काग्रेस पार्टी के प्रखर नेता मास्टर किशोरीलाल लोरैया, कोलियरी मालिक संघ के कन्हैयालाल बी मोदी, चिकित्सक डॉ. सुधाशु सरकार, मजदूर नेता स्वामी विश्वानंद, समाजवादी पार्टी के नेता व प्रसिद्ध पत्रकार मुकुटधारी सिंह, 'सर्चलाईट' के प्रतिनिधि धीरज मेहता, डीएवी स्कूल के प्रधानाध्यापक जीएन आचार्या, झरिया एकाडेमी के सहायक प्रधानाध्यापक सीताराम सिंह, झरिया के प्रथम विधायक शिवराज प्रसाद के पिता डॉ रामटहल लाल, प्रसिद्ध शिक्षक और पत्रकार लखनलाल केशरी, गुजराती स्कूल के शिक्षक हंसराज ठक्कर, कोलियरी मालिकों में सेठ फूलचन्द अग्रवाल, सासद परमेश्वर लाल अग्रवाल के पिता बनवारी लाल अग्रवाल, चीन कोठी के मालिक बाबूलाल ओझा आदि प्रमुख थे। देश-विदेश की राजनीति और अर्थनीति पर गर्मागर्म बहस चलती थी। अंग्रेजी सरकार से बिना डरे आजाद भारत का स्वप्न देखने वालों का अपने होटल में खुलेआम मिलन स्थल बनाने वाले मगन भाई को अक्सर मानभूम के अनमुंडल पदाधिकारी के यहा हाजिरी लगानी पड़ती थी। लेकिन, मगन भाई सदा अपने काम में मग्न रहते थे।

-प्रस्तुति: बनखंडी मिश्र

Posted By: Jagran

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