आसनसोल [अजय झा]: बंगाल की दुर्गापूजा केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अब पूरी दुनिया में मशहूर है। इसे मशहूर बनाने का सबसे बड़ा श्रेय यहां की बंगाली परंपरा को जाता है। दुर्गापूजा की विधि और आयोजन दोनों ही इसे सबसे अलग करती है। महानवमी में जहां पंडालों और मां के मंदिरों में पूजा के लिए भीड़ जुटी, वहीं कल विजयादशमी को अपनी परंपरा निभाने की तैयारी शुरू हो गई है। दरअसल, बंगाली रिवाज में दशमी को लोग सुबह आंख खुलते ही मछली देखते हैं, फिर घर मे खीर बनाकर खाते हैं। कहते हैं कि मां की विदाई से पहले जतरा बनाया जाता है। जतरा बनाने के तरीके में यह प्रक्रिया सबसे पहले दशमी को पूरी की जाती है।

सिक्के जुटाकर रुमाल में बांध मां को करते हैं अर्पित

मछली देखने और खीर खाने के बाद नियम है सिक्के जुटाना। हर घर के लोग सिक्के जुटाते हैं। नियम है कि घर में जितने सदस्‍य हैं, उतने सिक्के एकत्रित किए जाते हैं। इन सिक्कों को नए रुमाल में बांध कर मां को समर्पित करते हैं। पुजारी सिक्कों से बंधे हर रुमाल को संभाल कर रखते हैं। इसके बाद हर रुमाल में मां के चरण का अलता लगाकर प्रसाद सहित भक्तों को वापस कर देते हैं। भक्त पुजारी द्वारा दिए गए रुमाल को घर ले आते हैं। मां को चढ़ाए गए सिक्कों को लोग उस जगह पर रखते हैं, जहां रुपये रखे जाते हैं, जैसे गुल्लक, तिजोरी, अलमारी का लॉकर।

आलडीह के नयन साधु का कहना है कि सदियों से बंगाली परंपरा में यह रिवाज चला आ रहा है। लोगों का मानना है कि तिजोरी में मां के आशीर्वाद के तौर पर ये सिक्के रखे जाते हैं, ताकि कभी तिजोरी में धन की कमी ना हो। बाकी मां के चरण का अलता लगे रुमाल और फूल को लोग घर के मुख्य द्वार पर बांधते हैं, ताकि उनका घर नकारात्मक शक्तियों से बचा रहे और घर में सुख शांति रहे।

फिर होता है सिंदूर खेला...

सिक्कों को तिजोरी में रखने और रुमाल को घर के द्वार पर बांधने के बाद घर की महिलाएं पंडालों और मंदिरों में जाकर सिंदूर खेला करती हैं। इसके बाद में को आंसू भरी आंखों से ठीक उसी तरह विदाई देती हैं, जैसे घर की बेटी को ससुराल जाते समय विदाई दी जाती है। हर आंख मां की विदाई पर नम होती है।

Edited By: Deepak Kumar Pandey

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