धनबाद [ आशीष सिंह]। धनबाद में भूगर्भ में कोयला भंडार है। धरती के नीचे आग भी धधकती है। कोयले और आग की धरती पर फल-फूल की फसल भी हो रही है। भूली का धारजोरी आज अपनी खेती के बल पर नजीर बन गया है। यहां करीब 20 एकड़ जमीन पर जैविक खेती से फल-फूल उग रहे हैं। इसे सरअंजाम दिया है आरपीए फॉर्मिंग-द सेवियर्स की टीम ने। टीम में छह सदस्य हैं। हर सदस्य को इस खेती से करीब 30 हजार रुपये हर माह आय हो रही है। साथ ही 200 लोगों को रोजगार भी दिया गया है। ये टीम लीज पर बंजर जमीन लेती है। उसे उपजाऊ बनाकर फसल के लिए तैयार करती है। गेंदे के फूल, गोभी, तरोई व अन्य सब्जियों के साथ, पपीता, तरबूज, केला की खेती को आयाम दिया। चीकू, अनानास, अनार व संतरे के भी प्रयोग के तौर पर पौधे लगाए, जिनमें इस बार फल आ रहे हैं।

प्रशिक्षण से किसानों को भी मिल रहा लाभ

टीम के सदस्य रवि निषाद ने बताया कि खुद खेती करने वाले किसानों को प्रशिक्षण भी देते हैं। वे हमसे ही अपने खेतों के लिए जैविक खाद व पौधे ले जाते हैं। हमने उन लोगों को भी खेती से जोड़ दिया जो बंजर जमीन होने के कारण मजदूरी करने को मजबूर हो गए थे। मकसद यही था कि किसानों का पलायन रुके। गांव में रोजगार मिल सके। हमारी टीम प्रति एकड़ दस हजार रुपये प्रतिवर्ष किराये पर बंजर जमीन लेकर जैविक खेती करती है। इसमें 200 लोगों को रोजगार भी दिया है।

90 एकड़ बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने की मुहिम

बकौल रवि अभी उनके पास कुल 110 एकड़ जमीन हो गई है। 20 एकड़ में खेती कर रहे हैं। 90 एकड़ बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने में लगे हैं। जल्द ही यहां भी फसलें लहलहाएंगी। हम जमीन को विभिन्न साइट में बांटकर काम करते हैं। ताकि हर पौधे की देखभाल हो सके। करीब 200 लोग इससे जुड़े हैं जो अन्य कामकाज करने के बाद खेती करते हैं। हर माह छह से आठ हजार रुपये की प्रति व्यक्ति आय हो जाती है। प्रति एकड़ में हमारा समूह मिलकर निवेश करता है। पौधे और जैविक खाद में 70 से 80 हजार रुपये प्रतिवर्ष लागत आती है।

ऑनलाइन फल-फूल बेचने की तैयारी

फल-फूल की खेती की शुरुआत 2018 में 40 डिसमिल बंजर जमीन से हुई थी। पहली बार सारे पौधे बर्बाद हो गए। इसके बाद खेत को प्राकृतिक शोध संस्थान मध्य प्रदेश की मदद से उपजाऊ बनाया। कृषि वैज्ञानिक अमित मिश्रा ने इसमें अहम भूमिका निभाई। अभी 20 एकड़ में गेंदे के फूल की खेती और पपीता, केला, तरबूज, फूलगोभी की खेती कर रहे हैं। यहां से धनबाद की स्थानीय मंडियों के अलावा गिरिडीह, जामताड़ा, देवघर, हजारीबाग, रामगढ़, बोकारो तक सप्लाई हो रही है। बिहार और उत्तर प्रदेश से भी डिमांड आ रही है। जल्द ही ऑनलाइन भी हम इसे बेचेंगे।

 

परिवार के अर्थतंत्र में हमारा भी सहयोग

धारजोरी भूली की सरस्वती व बिमला देवी ने बताया कि खेती में काम करके हमें हर माह छह से दस हजार तक की आय हो जाती है। ये हमारे परिवार के काम आते हैं। स्वावलंबी बन गए हैं इससे जो खुशी मिलती है बयां नहीं कर सकते। अब हम कहीं बाहर नौकरी करने नहीं जाते। सोचा भी नहीं था कि बंजर जमीन में फूल खिलेंगे। रवि व उनके साथियों ने हम सभी को राह दिखाई।

 

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