अपनों से दूर बुजुर्गों के लिए बेटे का फर्ज निभा रही देवघर पुलिस, एक फोन पर मिलती है मदद
देवघर पुलिस ने 'सम्मान' अभियान शुरू किया है, जिसके तहत वे अकेले रहने वाले बुजुर्गों को सुरक्षा और भावनात्मक सहारा प्रदान कर रहे हैं।

पुलिसकर्मियों के साथ रिटायर्ड आईजी केडी सिंह। (स्रोत : देवघर पुलिस)
HighLights
देवघर पुलिस ने बुजुर्गों के लिए 'सम्मान' अभियान चलाया।
अकेले रहने वाले बुजुर्गों को सुरक्षा और भावनात्मक सहारा मिलता है।
पुलिसकर्मी बुजुर्गों के लिए बच्चों जैसा फर्ज निभा रहे हैं।
कंचन सौरभ मिश्रा, देवघर। खाकी का नाम सुनते ही अक्सर मन में कानून, सख्ती और कार्रवाई की तस्वीर उभरती है। मगर देवघर में पुलिस की एक पहल ने खाकी का दूसरा चेहरा सामने रखा है, वह है संवेदना, अपनापन और भरोसे का।
यहां पुलिस सिर्फ अपराधियों पर नजर नहीं रख रही, बल्कि उन बुजुर्गों के दरवाजे पर भी दस्तक दे रही है, जिनके बच्चे नौकरी या पढ़ाई के कारण उनसे दूर रहते हैं।
कोई अकेला है, तो कोई जीवनसाथी के साथ उम्र की ढलान पार कर रहा है। ऐसे बुजुर्गों के लिए देवघर पुलिस ‘सम्मान’ अभियान के तहत बेटे का फर्ज निभाने की कोशिश कर रही है।
अभियान से जुड़ने वाले बुजुर्गों का पंजीयन किया जाता है। इसके बाद संबंधित पुलिस अधिकारी उनके घर जाकर मुलाकात करते हैं, उनकी समस्याएं, परिवार का विवरण और घर में काम करने वाले लोगों की जानकारी लेते हैं। फिर पुलिस अधिकारी और बुजुर्ग के बीच ऐसा संपर्क कायम होता है, जिसमें जरूरत पड़ने पर एक फोन मदद का भरोसा बन जाता है।
वर्तमान में करीब 30 बुजुर्ग इस पहल से जुड़े हैं। पुलिस अधिकारी फोन पर हालचाल लेते हैं, समय-समय पर घर पहुंचते हैं और पर्व-त्योहार पर आशीर्वाद भी लेते हैं। बदले में बुजुर्ग भी इन पुलिसकर्मियों में अपने बच्चों की छवि देखने लगे हैं।
असुरक्षा कम हुई, परिवार के अंग बन गए पुलिस अधिकारी
सेवानिवृत्त आइजी केडी सिंह रानी कोठी, विलियम्स टाउन में अकेले रहते हैं। पत्नी का निधन 2019 में हो चुका है। उनके दो बेटे हैं, जिनमें एक दिल्ली और दूसरा एनसीआर में रहता है।
वह कहते हैं कि पुलिस समाज का प्राण है और पुलिसकर्मी उनके बच्चों के समान हैं। एएसआइ राजू रजवार अब उनके परिवार के सदस्य की तरह हैं। उम्र के इस पड़ाव पर अकेले रहने से पैदा होने वाली असुरक्षा की भावना काफी कम हुई है।
इसी तरह डॉ. टीपी सिंह पत्नी के साथ रहते हैं। उनकी तीन बेटियां हैं, जिनमें दो विदेश और एक बेंगलुरु में रहती हैं। अभियान से जुड़ने के बाद उन्हें अकेलापन कम महसूस होता है।

देवघर के वर्तमान एसपी प्रवीण पुष्कर।
होली के अवसर पर एसआई घनश्याम गंझू का उनके घर आना उन्हें खासा भावुक कर गया। उनका कहना है कि जरूरत पड़ने पर एक फोन कर लेते हैं और यह एहसास रहता है कि कोई अपना उनकी देखभाल के लिए है।
जलसार रोड निवासी बिदेंश्वरी प्रसाद नारायण देव के दो बेटे हैं। एक केंद्रीय खनन मंत्रालय में कार्यरत हैं और दूसरा बेंगलुरु में प्रोफेसर। वे कहते हैं कि एसआई मुकेश तिवारी से संपर्क करने पर तत्काल मदद मिलती है।
पहले घर सीसीटीवी की निगरानी में था, अब उन्हें लगता है कि सीधे पुलिस की निगरानी और भरोसा साथ है। एसआइ मुकेश तिवारी भी इसे अपने माता-पिता से मिलने जैसा अनुभव बताते हैं।
बंपास टाउन के निरारेंदु दत्ता और निमिता दत्ता के लिए एसआइ सुमंत प्रसाद ‘पक्के बेटे’ जैसे हैं। उन्हें बुलाने की जरूरत नहीं पड़ती, वे खुद हालचाल लेने पहुंच जाते हैं।
दंपती कहते हैं कि बच्चों के दूर रहने के बावजूद पुलिस ने उनके अकेलेपन को काफी हद तक दूर कर दिया है। वृजभान सिंह पथ स्थित सुमित्रा सदन में रहने वाले सेवानिवृत सरकारीकर्मी जय प्रकाश सिंह कहते हैं गत वर्ष होली के अवसर पर जब नगर थाना के एसआइ सुमंत प्रसाद उनसे आशीर्वाद लेने पहुंचे तो लगा जैसे उनका बेटे उनके पास है।
कुछ यूं हुई योजना की शुरुआत
क्राइम ब्रांच रांची में बतौर एसपी पदस्थापित सौरभ लगभग एक वर्ष पूर्व देवघर के एसपी हुआ करते थे। उन्होंने बताया कि उनकी मां अक्सर अकेली घर पर रहती हैं।

देवघर के तत्कालीन एसपी सौरभ।
ऐसे में उन्हें उनकी चिंता काफी सताती थी। उन्हें एहसास हुआ कि यही समस्या और बुजुर्गों के साथ भी होती होगी। इसे केंद्र में रखकर उन्होंने सम्मान योजना की शुरुआत की।
बकौल सौरभ, इस योजना के पीछे पुलिस की सामाजिक जिम्मेवारी को निभाना और बुजुर्गों को सुरक्षा मुहैया कराना है। अगर किसी अकेले या फिर पत्नी के साथ रहने वाले बुजुर्ग को दवा या मेडिकल की आपात जरूरत पड़ जाए तो पुलिस उन्हें मदद देती है।
पुलिस पता लगाती है कि किन-किन लोगों को बुढ़ापे में मदद की जरूरत है। वे पुलिस वाले के संपर्क में रहने से खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं।
यह भी पढ़ें- 6 से 8 महीने तक सस्पेंड रखना मानसिक शोषण...तीन महीने से ज्यादा निलंबन पर झारखंड पुलिस एसोसिएशन सख्त
सम्मान अभियान का उद्देश्य केवल बुजुर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि उनके बुढ़ापे की लाठी बनना भी है। जरूरत पड़ने पर दवा, चिकित्सा या आपात स्थिति में पुलिस सहायता उपलब्ध कराती है। साथ ही बुजुर्गों को डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी जैसे अपराधों के प्रति जागरूक किया जाता है। अकेले रहने वाले बुजुर्ग अपराधियों के आसान निशाने हो सकते हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा के साथ जागरूकता भी अभियान का अहम हिस्सा है।
