पटना में मधुपुर के मिट्टी के खिलौनों की धूम, दीपावली पर घरौंदे की पूजा के लिए बढ़ी मांग, 1902 से चली आ रही परंपरा
दीपावली के पावन पर्व पर पटना में मधुपुर के मिट्टी के खिलौनों की विशेष मांग है, पूजा के लिए उपयोग ...और पढ़ें

दीपावली और घरौंदे के लिए मधुपुर में पारंपरिक चाक पर मिट्टी के खिलौने तैयार करते स्थानीय कुम्हार
HighLights
पटना में दीपावली पर मधुपुर के मिट्टी के खिलौनों की विशेष मांग।
1902 से चली आ रही है मधुपुर के खिलौनों की परंपरा।
कुम्हारों को आधुनिक चुनौतियों के बावजूद अपनी कला पर गर्व है।
बालमुकुंद शर्मा, मधुपुर (देवघर)। दीपावली का पावन पर्व नजदीक आते ही घर-आंगन की साफ-सफाई के साथ-साथ पारंपरिक लोक उत्सवों की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। दीपावली के अवसर पर होने वाली घरौंदे की पूजा का सनातन संस्कृति में विशेष महत्व है, जिसमें भगवान को अर्पित करने और घरौंदे को सजाने के लिए विभिन्न प्रकार के मिट्टी के खिलौने, छोटे बर्तन, व्यंजन और मिठाइयां रखी जाती हैं।
इस प्राचीन परंपरा के कारण इन दिनों बिहार की राजधानी पटना के बाजारों में झारखंड के मधुपुर में बने मिट्टी के खिलौनों की विशेष मांग बनी हुई है। आधुनिकता और प्लास्टिक के चलन के इस दौर में भी मधुपुर के कुम्हारों की यह पारंपरिक कला अपनी अमिट पहचान बनाए हुए है।
1902 से पटना से जुड़ा है मधुपुर के खिलौनों का नाता
इस पुश्तैनी और पारंपरिक धंधे से पिछले सात दशकों से जुड़े 88 वर्षीय वरिष्ठ कुंभकार बसंत पंडित बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने वर्ष 1800 ईस्वी से ही मिट्टी के आकर्षक खिलौने बनाने की शुरुआत की थी।
ऐतिहासिक दस्तावेजों और पारिवारिक परंपरा के अनुसार, मधुपुर से विधिवत रूप से वर्ष 1902 से मिट्टी के खिलौने तैयार कर पटना भेजे जा रहे हैं। हालांकि उम्र के इस पड़ाव पर बसंत पंडित शारीरिक और नेत्र संबंधी थकान महसूस कर रहे हैं, लेकिन उनके पुत्र इस पुश्तैनी विरासत को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ा रहे हैं।
खिलौना निर्माण में जुटे विजय पंडित, विक्रम पंडित, कामदेव पंडित, बालो पंडित, बबलू पंडित और बीजू पंडित ने बताया कि इस सीजन की तैयारी दो महीने पहले ही शुरू कर दी जाती है, हालांकि इस वर्ष बारिश लंबी खींचने के कारण काम थोड़ा देर से आरंभ हुआ।
सवा लाख रुपये के माल की आपूर्ति और दूर-दूर तक पहुंच
कारीगरों के मुताबिक, इस बार पटना के व्यापारियों को लगभग सवा लाख रुपये के मिट्टी के खिलौने बेचने की योजना है, जिसके लिए वे दिन-रात जुटे हुए हैं। पिछले 35 वर्षों से लगातार मधुपुर आकर घरौंदे के लिए खिलौने ले जा रहीं 65 वर्षीय पटना की व्यापारी लालती देवी बताती हैं कि यहां के खिलौनों की फिनिशिंग और गुणवत्ता ग्राहकों को बहुत आकर्षित करती है।
मधुपुर में तैयार होने वाले ये मनमोहक खिलौने केवल पटना ही नहीं, बल्कि हजारीबाग, मुजफ्फरपुर, मोकामा, लखीसराय, बख्तियारपुर, बाढ़ और फतुहा जैसे प्रमुख शहरों तक भेजे जाते हैं। व्यापारी यहां आकर खुद खिलौनों की सुरक्षित पैकिंग करवाते हैं और ट्रकों के माध्यम से सड़क मार्ग से अपने गंतव्य तक ले जाते हैं।
आधुनिक चुनौतियां और कुम्हारों की उम्मीदें
निर्मल पंडित, मनोज पंडित और बालेश्वर पंडित जैसे स्थानीय कारीगरों का दर्द झलकता है कि दो दशक पहले की तुलना में अब इस धंधे में मुनाफा काफी कम रह गया है, जबकि परिवार के सभी सदस्यों को दो महीने तक दिन-रात कठिन परिश्रम करना पड़ता है।
उनका मानना है कि यदि सरकार चीनी (चाइनीज) उत्पादों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दे, तो पर्यावरण के अनुकूल इन स्वदेशी और पारंपरिक मिट्टी के खिलौनों के कारोबार को एक नई चमक मिल सकती है। पर्यावरण को लेकर आधुनिक समय में बढ़ रही जागरूकता इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में मिट्टी के उत्पादों का महत्व और अधिक बढ़ेगा।
