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उग्रवादी बृजेश गंझू के एनकाउंटर के साथ TSPC का The End, माओवादियों से 2 दशक तक लड़ी थी वर्चस्व की लड़ाई 

Published: Sun, 20 Sep 2026 08:54 AM (IST)Updated: Sun, 20 Sep 2026 09:37 AM (IST)

प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन टीएसपीसी के सुप्रीमो बृजेश सिंह गंझू पुलिस मुठभेड़ में मारा गया, जिससे संगठन के अस्तित्व पर विराम लग गया है।

बृजेश सिंह। फाइल फोटो

बृजेश सिंह। फाइल फोटो

HighLights

  1. टीएसपीसी सुप्रीमो बृजेश गंझू पुलिस मुठभेड़ में मारे गए, संगठन का अंत।

  2. बृजेश गंझू ने 2004 में माओवादियों के खिलाफ टीएसपीसी बनाई थी।

  3. टीएसपीसी और माओवादियों के बीच दो दशक तक वर्चस्व की लड़ाई।

जुलकर नैन, चतरा। प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन तृतीय सम्मेलन प्रस्तुति कमेटी (टीएसपीसी) के सुप्रीमो बृजेश सिंह गंझू उर्फ गोपाल सिंह भोक्ता उर्फ दुलारचंद गंझू उर्फ रंजन उर्फ फुलचंद गंझू उर्फ सरदार के पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने के साथ ही संगठन के अस्तित्व पर भी विराम लग गया है।

लावालौंग थाना क्षेत्र के लुटू सोहावन गांव निवासी स्वर्गीय पच्चु गंझू के पुत्र बृजेश गंझू ने वर्ष 2004 में प्रतिबंधित भाकपा माओवादी के खिलाफ समानांतर संगठन खड़ा किया था।

देखते ही देखते टीएसपीसी ने चतरा समेत रांची, हजारीबाग, रामगढ़, पलामू, लातेहार एवं बिहार के कुछ जिलों में अपनी गतिविधियां बढ़ा ली थीं। उस पर झारखंड सरकार ने 25 लाख और एनआईए ने 5 लाख का इनाम घोषित कर रखा था। वह एनआईए की मोस्ट वांटेड की लिस्ट में शामिल था। 

माओवादियों के साथ वर्चस्व की लड़ाई 

टीएसपीसी और भाकपा माओवादी के बीच करीब दो दशक तक वर्चस्व की खूनी लड़ाई चली। दोनों संगठनों के बीच कई बार मुठभेड़ और हिंसक घटनाएं हुईं। इस संघर्ष में दोनों पक्षों के उग्रवादियों के अलावा ग्रामीणों और अन्य लोगों की भी जान गई।

लंबे समय तक चले इस खूनी संघर्ष का असर चतरा के लावालौंग, कुंदा, प्रतापपुर समेत आसपास के इलाकों में भी देखने को मिला। दोनों संगठनों के बीच वर्चस्व की लड़ाई ने ग्रामीण क्षेत्रों में भय का माहौल पैदा कर दिया था।

मुखिया बनने के साथ उग्रवाद का रास्ता 

बृजेश गंझू ने उग्रवादी संगठन की कमान संभालने के साथ ही गांव की सरकार तक का सफर तय किया था। वह लावालौंग पंचायत से 2010 में निर्विरोध मुखिया निर्वाचित हुआ था।

मुखिया बनने के बाद भी उनका नाम उग्रवादी गतिविधियों से जुड़ा रहा। पुलिस के अनुसार, संगठन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी और वह लंबे समय से सुरक्षा बलों के निशाने पर था। 

बृजेश गंझू के नेतृत्व में टीएसपीसी ने चतरा और आसपास के क्षेत्रों में अपनी गतिविधियों का विस्तार किया। संगठन का मुख्य उद्देश्य भाकपा माओवादी के प्रभाव को चुनौती देना और रंगदारी वसूलना था।

इसी कारण दोनों संगठनों के बीच लगातार संघर्ष की स्थिति बनी रही। समय के साथ टीएसपीसी और माओवादी संगठन के बीच टकराव ने हिंसक रूप ले लिया।

टीएसपीसी द इंड

सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और उग्रवाद विरोधी अभियान के कारण पिछले कुछ वर्षों में टीएसपीसी समेत अन्य उग्रवादी संगठनों की गतिविधियां कमजोर हुईं। संगठन के कई प्रमुख सदस्य या तो मारे गए या गिरफ्तार हुए।

इससे संगठन की सक्रियता पर लगातार असर पड़ा। अब बृजेश गंझू के मुठभेड़ में मारे जाने के बाद टीएसपीसी के शीर्ष नेतृत्व समाप्त हो गया। करीब दो दशक तक भाकपा माओवादी के समानांतर खड़े रहे इस संगठन के लिए यह घटना निर्णायक मानी जा रही है।

बृजेश के साथ ही संगठन की कमान और उसके भविष्य पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि टीएसपीसी का प्रभाव अब लगभग समाप्ति की ओर पहुंच गया है।

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