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इटखोरी में 250 साल पुरानी दुर्गा पूजा की परंपरा आज भी जीवंत, भैंसे की जगह दी जाती है गन्ने व भुआ कोहड़े की बलि

Published: Fri, 25 Sep 2026 04:02 PM (IST)

इटखोरी के टाल पर राजा हरि नारायण सिंह द्वारा शुरू की गई लगभग ढाई सौ साल पुरानी दुर्गा पूजा की ऐतिहासिक परंपरा आज भी जीवंत है।

250 साल पुरानी दुर्गा पूजा की परंपरा आज भी जीवंत

250 साल पुरानी दुर्गा पूजा की परंपरा आज भी जीवंत

HighLights

  1. इटखोरी टाल पर 250 साल पुरानी दुर्गा पूजा परंपरा आज भी जीवंत।

  2. 1920 से वैष्णवी पूजा, भैंसे की जगह गन्ने-कोहड़े की बलि।

  3. कलश स्थापना हेतु राजगढ़ से मिट्टी लाने की अनूठी प्रथा जारी।

पंकज कुमार सिंह, इटखोरी (चतरा)। इटखोरी के टाल पर की राजा-महाराजाओं के समय से चली आ रही दुर्गा पूजा की ऐतिहासिक परंपरा आज भी जीवंत है। लगभग ढाई सौ साल पहले इस ऐतिहासिक पूजा की शुरुआत इटखोरी टाल के राजा हरि नारायण सिंह ने की थी। तब से यह सुचारू रूप से यहाx होती आ रही है। 

वर्तमान में इटखोरी के ग्रामीण इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। लगभग ढाई सौ साल पहले टाल पर दुर्गा पूजा का आयोजन शुरू होने के बाद धीरे-धीरे पितीज, गुल्ली, करनी, परसौनी, परोका और इटखोरी बाजार में भी दुर्गा पूजा का आयोजन होने लगा। 

1920 के बाद से मंदिर में वैष्णवी पूजा आरंभ 

हालांकि अन्य जगहों पर पूजा शुरू होने के बावजूद टाल की दुर्गा पूजा से प्रखंड के लोगों की श्रद्धा और आस्था आज भी गहराई से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि नवरात्र के पावन अवसर पर प्रखंड के अधिकांश गांवों के लोग टाल पर विराजमान मां दुर्गा का दर्शन करने आवश्यक रूप से आते हैं। 

पूर्व में यहां राजा की ओर से बलि प्रथा के साथ पूजा की जाती थी, लेकिन वर्ष 1920 के बाद से मंदिर में वैष्णवी पूजा आरंभ हो गई। पुरानी परंपरा को कायम रखने के लिए नवमी के दिन भैंसे के स्थान पर गन्ने और भुआ कोहड़े की बलि दी जाने लगी।

कलश स्थापना के लिए पुजारी राजगढ़ से एक पैर पर लाते हैं मिट्टी

इस ऐतिहासिक पूजा की एक खास बात नवरात्र के पहले दिन की कलश स्थापना विधि है। कलश स्थापना से पूर्व आज भी राजा हरि नारायण सिंह के राजगढ़ से पारंपरिक रूप से मिट्टी लाई जाती है। पुजारी यहां से एक पैर पर मिट्टी ले जाते हैं। जिसके बाद ही कलश स्थापना की विधि संपन्न होती है। 

इटखोरी टाल के राजा ने इस दुर्गा मंडप को गांव के समीप एक ऊंचे टीले पर स्थापित किया था। ऊंचे स्थान पर होने के कारण वहां का वातावरण काफी खुशनुमा रहता है। यहां कलश स्थापना के दिन से ही सुबह नवरात्र कथा और रात में महाआरती शुरू हो जाती है। आरती में सैकड़ों लोग जमा होकर भाग लेते हैं और महिलाएं देर रात तक देवी माँ के गीत गाती हैं। इटखोरी टाल को ऐतिहासिक पूजा स्थल होने का गौरव प्राप्त है।

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