'लाल आतंक' के गढ़ में खिलेगा शिक्षा का कमल, कुंदा और हंटरगंज के बीच खुलेगा नया डिग्री कॉलेज
चतरा जिले के कुंदा और हंटरगंज क्षेत्रों में अब डिग्री कॉलेज खुलेगा, जिससे लाल आतंक से प्रभावित रहे इन इलाकों में शिक्षा की नई रोशनी फैलेगी।

प्रस्तुति के लिए इस्तेमाल की गई तस्वीर। (जागरण)
HighLights
कुंदा-हंटरगंज में नया डिग्री कॉलेज खुलेगा।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा का विस्तार।
ग्रामीण छात्रों को उच्च शिक्षा का लाभ मिलेगा।
जुलकर नैन, चतरा। कभी लाल आतंक के कारण पहचान रखने वाले कुंदा और हंटरगंज क्षेत्र में अब शिक्षा की नई रोशनी फैलने वाली है। जिला प्रशासन ने दोनों प्रखंडों के मध्य नए डिग्री कॉलेज की स्थापना की दिशा में पहल तेज कर दी है।
उपायुक्त रवि आनंद की ओर से हंटरगंज एवं कुंदा के अंचल अधिकारियों को उपयुक्त भूमि चिन्हित कर हस्तांतरण प्रस्ताव उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है।
उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग, झारखंड सरकार के निर्देश पर शुरू हुई इस प्रक्रिया के तहत महाविद्यालय निर्माण के लिए 10 एकड़ भूमि उपलब्ध कराई जानी है।
कॉलेज खुलने से दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों के छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा के लिए अब सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय नहीं करनी पड़ेगी। विशेषकर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थियों को इसका बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है।
वर्षों पुरानी मांग पूरी होने की उम्मीद
हंटरगंज, प्रतापपुर और कुंदा क्षेत्र लंबे समय तक उग्रवाद की गतिविधियों से प्रभावित रहे हैं। यहां उच्च शिक्षा संस्थान नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में विद्यार्थी इंटर के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं।
कई छात्रों को गया, हजारीबाग अथवा चतरा मुख्यालय जाना पड़ता है, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कॉलेज की स्थापना से न केवल शिक्षा का स्तर सुधरेगा, बल्कि क्षेत्र में सामाजिक और आर्थिक बदलाव भी आएगा।
छात्र संगठन और बुद्धिजीवियों ने जिला प्रशासन की इस पहल का स्वागत किया है। लोगों का मानना है कि शिक्षा के विस्तार से युवाओं का रुझान मुख्यधारा की ओर बढ़ेगा और क्षेत्र विकास की नई पहचान बना सकेगा। अब सबकी नजर भूमि चयन और सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है।
माओवादियों का रहा है गढ़
उपर्युक्त क्षेत्र एक समय मे भाकपा माओवादी उग्रवादियों का गढ़ रहा है। करीब साढ़े तीन दशक तक उनका दबदबा रहा। विकास से लेकर जनकल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन में उनकी सहमति अनिवार्य होती थी। उससे उन्हें रंगदारी के रूप में मोटी राशि मिलती थी।
खूनी हिंसा के बल पर स्वयं को स्थापित किए थे। लेकिन पुलिसिया कार्रवाई ने धीरे-धीरे पूरे संगठन को ध्वस्त कर दिया। नक्सल मुक्त क्षेत्र बनाने के लिए सालों साल पुलिस की कार्रवाई चली है। इसमें दर्जनों जवान बलिदान हुए हैं।
