95 साल की उम्र और आज भी नंगे पैर, चप्पल पहनते ही होती है परेशानी; चतरा के काशी यादव की अनोखी कहानी
95 वर्षीय काशी यादव ने अपने जीवन में कभी जूते-चप्पल नहीं पहने, न ही दवा खाई और न ही उन्हें ...और पढ़ें

काशी यादव की फाइल फोटो। जागरण
HighLights
95 वर्षों में कभी नहीं पहने जूते-चप्पल, नंगे पैर ही रहे।
जीवन में कभी दवा का सेवन नहीं किया, स्वस्थ जीवन।
आकाश सिंह, मयूरहंड (चतरा)। नाम काशी यादव और उम्र 95 वर्ष। जीवन के करीब एक सदी के सफर में न कभी पैरों में चप्पल पड़ी और न जूते। बीमारी की बात करें तो काशी यादव ने कभी दवा तक नहीं खाई। आंखों की रोशनी भी ऐसी कि बिना चश्मे के चीजें साफ दिखाई देती हैं। काशी यादव मयूरहंड प्रखंड के करमा गांव के रहने वाले हैं।
काशी यादव बताते हैं कि उन्होंने बचपन से लेकर आज तक कभी चप्पल या जूता नहीं पहना। यहां तक कि अपनी शादी के दिन भी उनके पैर नंगे ही रहे। परिवार के किसी सदस्य ने एक बार उन्हें चप्पल पहनने के लिए दी थी, लेकिन उन्हें चप्पल पहनकर चलना सहज नहीं लगा। उनका कहना है कि चप्पल या जूता पहनने के बाद उन्हें चलने में परेशानी होती है।
इसी कारण उन्होंने चप्पल को जंगल में फेंक दिया और फिर कभी उसे पहनने की कोशिश नहीं की। काशी यादव की जिंदगी में ऐसा कोई खास मौका भी नहीं आया, जब उन्होंने जूता-चप्पल पहनना जरूरी समझा हो। शादी-विवाह, सामाजिक कार्यक्रम और अन्य आयोजनों में भी वे हमेशा नंगे पैर ही पहुंचे। गांव के लोग भी उन्हें वर्षों से इसी रूप में देखते आ रहे हैं।

मौसम चाहे गर्मी का हो या ठंड का, उनके पैरों में जूता-चप्पल दिखाई नहीं देता। काशी यादव की कहानी सिर्फ नंगे पैर रहने तक सीमित नहीं है। वे बताते हैं कि आज तक कभी गंभीर रूप से बीमार नहीं पड़े और न ही कभी नियमित रूप से कोई दवा खाई। बढ़ती उम्र के बावजूद वे अपने दैनिक काम स्वयं करने की कोशिश करते हैं।
हालांकि उम्र के इस पड़ाव पर शरीर में स्वाभाविक रूप से आने वाले बदलावों से वे भी अछूते नहीं हैं। आमतौर पर उम्र बढ़ने के साथ आंखों की रोशनी कमजोर होने लगती है और चश्मे की जरूरत पड़ती है। लेकिन काशी यादव का दावा है कि उन्होंने आज तक चश्मा नहीं लगाया। 95 वर्ष की उम्र में भी उन्हें सामान्य चीजें बिना चश्मे के साफ दिखाई देती हैं।
यही वजह है कि गांव में उनकी जीवनशैली को लेकर लोगों में खासा कौतूहल बना रहता है। काशी यादव की पूरी जिंदगी बेहद सादगी में गुजरी है। आधुनिक जीवनशैली से दूर उन्होंने अपनी सुविधा के अनुसार जीवन जीना पसंद किया। पैरों में जूते-चप्पल न पहनना उनके लिए कोई दिखावा नहीं, बल्कि बचपन से चली आ रही आदत है।
उनका मानना है कि नंगे पैर चलने में उन्हें हमेशा सहजता महसूस हुई और चप्पल-जूते में उन्हें परेशानी होती है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि काशी यादव वर्षों से इसी तरह जीवन जीते आ रहे हैं।
उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी दिनचर्या और जीवनशैली में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है। उनकी कहानी ग्रामीण जीवन की उस सादगी की याद दिलाती है, जिसमें सुविधाएं कम थीं, लेकिन लोग अपनी आदतों और प्राकृतिक जीवनशैली के साथ सहज होकर जीवन बिताते थे।
