1968 की वो काली रात... जब गायब हो गईं 2 देवियां, चतरा में मां भद्रकाली की मूर्ति के पास छिपा है सदियों पुराना राज
चतरा के इटखोरी स्थित मां भद्रकाली मंदिर में प्राचीन मूर्ति के चरणों के पास मौजूद शिलालेख सदियों पुराने इतिहास की ...और पढ़ें

मां भद्रकाली मंदिर की फाइल फोटो। जागरण
HighLights
मां भद्रकाली मंदिर है इटखोरी की पहचान।
मंदिर में मां भद्रकाली की प्राचीन मूर्ति भी शामिल है।
पंकज कुमार सिंह, इटखोरी (चतरा)। मां भद्रकाली मंदिर इटखोरी की पहचान है। यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का बड़ा केंद्र होने के साथ अपने पुराने इतिहास के लिए भी जाना जाता है। मंदिर परिसर में आज भी कई पुरानी मूर्तियां और ऐतिहासिक अवशेष मौजूद हैं। इन्हीं में मां भद्रकाली की प्राचीन मूर्ति भी शामिल है।
मां भद्रकाली की मूर्ति के चरणों के पास पत्थर पर ब्राह्मी जैसी लिपि में कुछ शिलालेख खुदे हुए हैं। इन शिलालेखों के आधार पर स्थानीय स्तर पर यह कहा जाता है कि मूर्ति का निर्माण बंगाल और मगध के राजा महेंद्र पाल के आदेश पर 10वीं से 11वीं शताब्दी के दौरान कराया गया था। हालांकि शिलालेख के बारे में पूरी जानकारी सामने लाने के लिए विशेषज्ञों द्वारा इसका अध्ययन किया जाना जरूरी है।
मंदिर में मां भद्रकाली को मां मंगला गौरी के सौम्य रूप में स्थापित माना जाता है। काले पत्थर से बनी यह मूर्ति अपनी कलाकारी के लिए भी खास है। मूर्ति पर समय का खास असर नहीं दिखाई देता है। इसकी बनावट और नक्काशी आज भी लोगों को आकर्षित करती है। इटखोरी में मां भद्रकाली मंदिर के अलावा भी हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म से जुड़े कई पुराने अवशेष मौजूद हैं।
यही वजह है कि इटखोरी को धार्मिक आस्था के साथ इतिहास की धरती भी माना जाता है। मां भद्रकाली की मूर्ति के पास मौजूद शिलालेख इस पुराने इतिहास की एक अहम कड़ी हैं। अगर पुरातत्व विशेषज्ञ इसकी वैज्ञानिक तरीके से जांच करें तो इटखोरी के इतिहास से जुड़ी और जानकारी सामने आ सकती है।

1968 में चोरी हो गई थीं दोनों मूर्तियां
मंदिर से जुड़ा एक और पुराना किस्सा मूर्तियों की चोरी का है। बताया जाता है कि वर्ष 1968 में मां भद्रकाली की मूर्ति के साथ बगल में स्थापित देवी दुर्गा की आठ भुजाओं वाली मूर्ति भी चोरी हो गई थी।
बाद में मां भद्रकाली की मूर्ति तो बरामद हो गई, लेकिन देवी दुर्गा की दूसरी मूर्ति आज तक नहीं मिल सकी।बताया जाता है कि मां भद्रकाली की मूर्ति गोमेद या अष्टधातु से बनी है। यह मूर्ति अपनी उत्कृष्ट कलाकृति के कारण खास मानी जाती है। बरसों बीत जाने के बाद भी मूर्ति की चमक और नक्काशी लोगों को आकर्षित करती है।
पत्थर पर दर्ज इतिहास को बचाने की जरूरत
मूर्ति के चरणों के पास मौजूद पुराने शिलालेख अब पहले की तरह साफ नहीं दिखते हैं। पूजा के दौरान लगातार जल और अन्य पूजन सामग्री चढ़ाए जाने से पत्थर पर खुदे अक्षर धीरे-धीरे धुंधले हो रहे हैं। ऐसे में इस ऐतिहासिक लिखावट को सुरक्षित रखने की जरूरत है।
