जागरण संवाददाता, बोकारो। राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने संतालियों के धर्म महासम्मेलन में झारखंड में देश का पहला आदिवासी विश्वविद्यालय स्थापित किए जाने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि इसके लिए प्रधानमंत्री की सहमति मिल चुकी है। राज्यपाल सोमवार को बोकारो जिले के ललपनिया स्थित लुगूबुरु घंटाबाड़ी धोरोमगढ़ परिसर में आयोजित कार्यक्रम में लोगों को संबोधित कर रही थीं। कहा कि इससे आदिवासी समाज के उत्थान को बल मिलेगा। सभी संताली अपनी सभ्यता-संस्कृति एवं धर्म को अक्षुण्ण रखने के लिए संकल्प की भावना के साथ एकजुट हों। इसी में संतालियों की पहचान निहित है।
आधा पेट खाएं बच्चों को पढ़ाएं
कहा कि जो आदिवासी अपनी भाषा नहीं बोल पाएगा, वह अपनी संस्कृति से कट जाएगा। आधा पेट खाएं लेकिन बच्चे को स्कूल जरूर भेजें। शिक्षा ही स्तर को बदल सकती है।
लुगूबुरु में बनेगा रोपवे
राज्यपाल ने कहा कि लुगूबुरु के विकास के लिए सरकार ने पांच करोड़ की राशि दी थी। इस बार आयोजन के लिए भी राशि दी गई है। यहां रोपवे बनेगा ताकि यह एक पर्यटकस्थल के रूप में विकसित हो सके।
लुगूबुरु देवताओं की धरती
राज्यपाल ने लुगूबुरु घंटाबाड़ी के धार्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हजारों वर्ष पुरानी आदिवासी संस्कृति का आविर्भाव यहीं हुआ। जब बारिश के समय अपने परिवार के सदस्यों से पूछते थे कि यह वर्षा का पानी कहां से आता है तो बुजुर्ग कहा करते थे कि यह बादल से बरसनेवाला पानी लुगूबुरु से आता है।

संताली में भी लिखी जाए मुद्रा की कीमत : हेमंत
झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष सह नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि संताली भाषा बोलनेवाले लोगों की संख्या पूरे देश में 0.6 प्रतिशत है। संताली भारत की आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध है। भारतीय मुद्रा के सभी नोटों पर भारत की 15 अलग-अलग भाषाओं में मुद्रा की कीमत अंकित रहती है। बोलनेवालों की बहुलता को देखते हुए संताली भाषा को भी नोटों पर स्थान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज विश्व के सभी आदिवासी समुदाय के लिए एकजुट होकर अपनी भाषा, सभ्यता, संस्कृति एवं धर्म को बचाने का संकल्प लेने का दिन है।

अपनी परंपरा न भूलें : शिबू
झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन ने कहा कि जिस प्रकार अन्य लोग अपने धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए एकता और संकल्प के साथ काम कर रहे हैं, उसी प्रकार संताली भी अपने धर्म एवं संस्कृति को बरकरार रखने के लिए संकल्प लें। हम आदिवासी भले ही जंगल-पहाड़ से शहर की ओर आ गए हैं, लेकिन अपनी सामाजिक परंपरा एवं व्यवस्था को न भूलें।

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Posted By: Bhupendra Singh

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