केसर के खेतों में रोबोट की एंट्री, फूल तोड़ने से खरपतवार हटाने तक काम करेगा; कश्मीर में वैज्ञानिकों की नई तकनीक
वैज्ञानिकों ने केसर की खेती में रोबोट के उपयोग का परीक्षण किया है, जिससे उत्पादकों को फूल तोड़ने और खरपतवार ...और पढ़ें

कश्मीर के केसर खेतों में रोबोट पहचानेंगे फूल और खुद करेंगे कटाई। (फाइल फोटो)
HighLights
केसर की खेती में रोबोट का सफल परीक्षण।
फूल तोड़ने, खरपतवार हटाने में मिलेगी मदद।
श्रम की कमी दूर होगी, उत्पादन बढ़ेगा।
जागरण संवाददाता, श्रीनगर। केसर उत्पादकों के लिए अच्छी खबर है। अब उन्हें केसर के खेतों से फूलों को इकट्ठा करने और खरपतवार हटाने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। यह काम अब रोबोट करेंगे। वैज्ञानिक इस रोबोट का परीक्षण कर रहे हैं और इसका पेटेंट भी तैयार कर लिया गया है।
बता देते हैं कि घाटी की सब से कीमती फसल केसर को जमा करना एक मेहनत भरा काम होता है। केसर के खेतों में एक किलोग्राम कीमती केसर निकालने के लिए लगभग 1.6 लाख फूलों को हाथ से अलग करना पड़ता है और इस काम के दौरान उत्पादकों के पसीने छूट जाते हैं।
अबत्ता केसर जमा करने की इस प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए रोबोट तैयार कर रहे हैं। इन रोबोट का मकसद केसर की खेती से जुड़े सबसे अधिक मेहनत वाले कामों को अपने जिम्मे लेना है।
पांपोर के रिसर्च स्टेशन में रोबोटिक सिस्टम का प्रदर्शन
सेफरान टाउन कहलाने वाले पांपोर के कोनिबल स्थित एडवांस्ड रिसर्च स्टेशन फार सैफरान एंड सीड स्पाइसेस में इन मशीनों का परीक्षण किया गया। यहां वैज्ञानिकों ने ऐसे रोबोटिक सिस्टम का प्रदर्शन किया, जो खेतों से खरपतवार (अवांछित पौधे) हटाने, केसर के फूल तोड़ने और उनके नाजुक स्टिग्मा को अलग करने में सक्षम हैं।
इलेक्ट्रानिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा समर्थित और शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी आफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलाजी आफ कश्मीर के सहयोग से किए गए इन फील्ड ट्रायल ने किसानों को यह दिखाया कि कैसे आटोमेशन तकनीक घाटी की इस सबसे कीमती खेती और प्रोसेसिंग के तरीके को बदल सकती है।
केसर की खेती में इंसानी मेहनत घटाना सबसे बड़ी चुनौती
वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इंसानी मेहनत पर निर्भरता को कम करना है, जो केसर की खेती में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बनी हुई है। सकास्ट में रिसर्च डायरेक्टर और इस प्रोजेक्ट के चीफ प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर प्रोफेसर सैयद जमीर हुसैन ने बताया कि केसर के उत्पादन में फूल तोड़ना और उनसे स्टिग्मा को अलग करना सबसे ज्यादा मेहनत और समय लेने वाले काम हैं।
उन्होंने बताया कि सिर्फ एक किलोग्राम सूखा केसर पाने के लिए, किसानों को लगभग 1,60,000 फूलों से उनके स्टिग्मा अलग करने पड़ते हैं।वैज्ञानिक अब ऐसे रोबोटिक हाथ विकसित कर रहे हैं, जिनमें विज़न सिस्टम लगा है। ये सिस्टम खेतों में फूलों की पहचान कर उन्हें तोड़ सकते हैं। इसके अलावा, ऐसी मशीनें भी तैयार की जा रही हैं जो फूल तोड़ने के बाद उनके लाल स्टिग्मा को अलग कर सकें।
अगले साल तक किसानों को मिल सकती हैं रोबोटिक मशीनें
प्रोफेसर हुसैन ने बताया कि इन परीक्षणों के नतीजे उत्साहजनक रहे हैं और शोधकर्ताओं का लक्ष्य है कि अगले साल तक किसानों के लिए खेतों में इस्तेमाल होने लायक मशीनें उपलब्ध करा दी जाएं। सोमवार को एक और प्रोटोटाइप का प्रदर्शन किया गया, जो खरपतवार हटाने वाला एक 'आटोनामस रोबोट है। इ
से केसर के खेतों में लगातार उगने वाली खरपतवार की समस्या को दूर करने के लिए विकसित किया गया है। अन्य फसलों के विपरीत, जहां खरपतवार हटाने का काम किसी खास मौसम तक ही सीमित होता है, केसर के खेतों में लगभग पूरे साल ध्यान देने की जरूरत होती है।
यह रोबोट खरपतवार की पहचान कर उसे हटाने के लिए डिज़ाइन किया गया है, और इसके नेविगेशन (चलने-फिरने) तथा कामकाज को एक मोबाइल एप्लिकेशन के जरिए नियंत्रित किया जाता है।
अगले एक-दो महीने तक जारी रहेंगे रोबोट के परीक्षण
स्कास्ट-के के वाइस चांसलर प्रो. नज़ीर अहमद गनई ने बताया कि इन मशीनों को सी-डीएसी कोलकाता औरसीएमईआरआई दुर्गापुर जैसे प्रमुख राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से विकसित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अगले एक-दो महीनों तक इनका ट्रायल चलता रहेगा, जबकि इस तकनीक को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए पूरी तरह से तैयार होने में एक से दो साल लग सकते हैं।
गनाई ने बताया कि जम्मू-कश्मीर के किसानों के लिए कृषि मजदूरों की कमी एक गंभीर चिंता का विषय बन गई है, क्योंकि युवा अब शारीरिक मेहनत वाले खेती के कामों को करने से कतराने लगे हैं। उन्होंने कहा कि हालांकि जलवायु परिवर्तन, लंबे समय तक सूखा पड़ना और मौसम में अनिश्चितता ने केसर के उत्पादन को प्रभावित किया है, लेकिन खेती के लिए पूरी तरह से इंसानी श्रम पर निर्भर रहना भी इसे जारी रखने में एक बड़ी बाधा है।
उन्होंने कहा कि मशीनीकरण से इस समस्या को दूर करने में मदद मिल सकती है और इससे युवा पीढ़ी के लिए केसर की खेती अधिक आकर्षक बन सकती है।
केसर की घटती पैदावार और खेती की मुश्किलें दूर करने का लक्ष्य
स्कास्ट-के, के ''सेंटर फार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एंड मशीन लर्निंग'' के प्रभारी डा. शौकत रसूल ने बताया कि इस प्रोजेक्ट की शुरुआत लगभग एक साल पहले हुई थी। इसका मकसद केसर की खेती के रकबे और पैदावार में आ रही कमी, तथा पारंपरिक तरीके से खेती करने में आने वाली मुश्किलों का समाधान खोजना था। उन्होंने बताया कि फसल चक्र के महत्वपूर्ण चरणों - जैसे नवंबर, मार्च और जून-जुलाई के दौरान - इस आटोमेटेड वीडिंग सिस्टम (खरपतवार हटाने वाली मशीन) का सफल परीक्षण किया जा चुका है।
यह प्रोजेक्ट अब अपने दूसरे साल में है। इसमें सीएमईआरआई दुर्गापुर, सीएमईआ्रआई लुधियाना, सीएमटीआई बेंगलुरु, सी-डीएसी कोलकाता और सी-डीएसी मोहाली शामिल हैं। इलेक्ट्रानिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय) में आरएंडडी (आईटी) की वैज्ञानिक और ग्रुप कोआर्डिनेटर, डा. सुनीता वर्मा ने बताया कि इस पहल का मकसद किसानों की व्यावहारिक समस्याओं को हल करने के लिए इलेक्ट्रानिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करना है।
केसर के अलावा, इस प्रोग्राम में अखरोट और सेब की खेती में तकनीकी सुधारों को भी शामिल किया गया है। डा. वर्मा ने बताया कि इस प्रोजेक्ट को तैयार करते समय किसानों से सलाह ली गई थी और अब प्रोटोटाइप (नमूनों) के मूल्यांकन में भी उन्हें शामिल किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि मशीनों की कमियों को पहचानने और उन्हें खेतों की वास्तविक परिस्थितियों के हिसाब से उपयुक्त बनाने में किसानों का फीडबैक बहुत महत्वपूर्ण होगा। सोमवार को किया गया प्रदर्शन, एग्री-एक्सीलेंस'' नामक नेशनल प्रोग्राम के तहत नेशनल स्टीयरिंग कमिटी की तीसरी बैठक का हिस्सा था।
यह प्रोग्राम हिमालयी क्षेत्र में फसल प्रबंधन के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और आईसीटी (सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी) के इस्तेमाल पर केंद्रित है। यूनिवर्सिटी ने केसर की क्यारियां तैयार करने और केसर के कंद लगाने के लिए भी मशीनें विकसित की हैं। इनमें से कंद लगाने वाली मशीन रिसर्च स्टेशन पर पहले से ही काम कर रही है।
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