अफजल बेग से लेकर GM शाह तक... नेकां से बगावत करने वालों का क्या हुआ हश्र? अब रुहुल्लाह पर टिकीं नजरें
रुहुल्ला मेहदी का नेशनल कॉन्फ्रेंस से संभावित इस्तीफा पार्टी के लिए चुनौती और उनके राजनीतिक भविष्य की अग्निपरीक्षा है। यह ...और पढ़ें

3 नवंबर को इस्तीफा देंगे रुहुल्लाह मेहदी। (फाइल फोटो)
HighLights
रुहुल्ला का इस्तीफा नेकां और उनके भविष्य की परीक्षा।
नेकां ने कई बड़े नेताओं के जाने के बाद भी अस्तित्व बनाए रखा।
रुहुल्ला की 2024 जीत व्यक्तिगत या पार्टी प्रभाव का सवाल।
नवीन नवाज, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर की राजनीति में आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी का संभावित इस्तीफा केवल नेशनल कान्फ्रेंस (नेकां) के लिए चुनौती नहीं, बल्कि खुद उनके राजनीतिक भविष्य की भी बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है। रुहुल्ला ने पार्टी नेतृत्व से अपने मतभेद सार्वजनिक करते हुए तीन नवंबर को लोकसभा की सदस्यता और पार्टी, दोनों से इस्तीफा देने का एलान कर रखा है और इसके लिए उन्होंने बडगाम में अपने बलिदानी पिता की बरसी पर एक रैली का आयोजन किया है।
यदि वह अपने फैसले पर कायम रहते हैं, तो संसदीय कार्यकाल के करीब तीन साल शेष रहते हुए पद छोड़ने का उनका कदम जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और नैतिक संदेश देते हुए सत्ताधारी नेशनल कान्फ्रेंस में अंतर्कलह और पार्टी नेतृत्व के मुश्किल पैदा कर सकताहै। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया है कि वह पार्टी नहीं तोड़ रहे हैं और न असंतुष्ट विधायकों के साथ संपर्क में हैं। दूसरी तरफ असंतुष्ट विधायकों ने भी पार्टी से अलग होने से इंकार किया है।
50 साल में पहली बार नेकां नेतृत्व को खुली चुनौती
जम्मू कश्मीर में विभिन्न राजनीतिक दलों का इतिहास देखा जाए तो नेशनल कान्फ्रेंस एकमात्र ऐसा राजनीतिक दल है,जिसने महाराजा के खिलाफ आंदोलन करने से लेकर रायशुमारी तक का अभियान चलाया है। जिसने स्वायत्तता के लिए भी अभियान चलाया और जिसमें विभाजन भी हुआ अेर कई बड़े नेताओं ने अपना अलग रास्ता चुनाहालांकि, 1947 के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था के विकास से लेकर अब तक प्रदेश की राजनीति केंद्र के हस्तक्षेप, सरकारों की बर्खास्तगी और राजनीतिक उठापटक से भी प्रभावित रही है।
ऐसे में रुहुल्ला का संभावित इस्तीफा इस सवाल को फिर सामने लाता है कि क्या किसी बड़े राजनीतिक दल से अलग होकर नेता अपनी स्वतंत्र लोकप्रियता और जनाधार के दम पर नई राजनीतिक ताकत खड़ी कर सकता है? नेशनल कान्फ्रेंस का अगर राजनीतिक इतिहास खंगाला जाए तो बीते 50 वर्ष में पहली बार पार्टी नेतृत्व को खुलेआम चुनौती मिल रही है,उसके फैसलों पर सवाल उठाया जा रहा है।
वादों से पीछे हटने का आरोप
रुहुल्लाह की नाराजगी की जड़ 2024 के चुनावों में नेशनल कान्फ्रेंस द्वारा किए गए वादे हैं। उनके मुताबिक, पार्टी ने भाजपा के कथित एजेंडे के खिलाफ जम्मू-कश्मीर के लोगों के अधिकारों की रक्षा, पूर्ववर्ती राज्य का दर्जा और विशेष संवैधानिक स्थिति बहाल करने, युवाओं को रोजगार देने तथा आरक्षण नीति में ओपन मेरिट उम्मीदवारों के साथ कथित अन्याय दूर करने का वादा किया था।
उनका आरोप है कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार ने सत्ता में आने के बाद वही किया, जो भाजपा अपनी सरकार बनने पर करती। रुहुल्ला ने यहां तक आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री की कुर्सी के लालच में नेशनल कान्फ्रेंस ने कश्मीर में यथास्थिति बनाए रखने और उसे सामान्य बनाने में भाजपा की मदद की। उनके अनुसार, नेकां और भाजपा अब राजनीतिक एवं वैचारिक विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की सहयोगी हैं।
उनका यह भी मानना है कि फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली पार्टी में उनके जैसे स्वतंत्र विचार रखने वाले नेताओं के लिए अब पर्याप्त राजनीतिक जगह नहीं बची है। वह चाहते हैं कि राज्य के दर्जे की बहाली के साथ अनुच्छेद 370 और 35-ए का मुद्दा भी पार्टी मजबूती से उठाए।
नेकां का इतिहास: बड़े विद्रोह, लेकिन पार्टी कायम
नेशनल कॉन्फ्रेंस का इतिहास बताता है कि उससे अलग होने वाले कई बड़े नेता अपनी अलग राजनीतिक पहचान कायम नहीं रख सके।
मिर्जा मोहम्मद अफजल बेग इसका शुरुआती उदाहरण हैं। शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के करीबी सहयोगी रहे बेग ने 1978 में मतभेदों के बाद उपमुख्यमंत्री पद छोड़ा और बाद में इंकलाबी नेशनल कान्फ्रेंस बनाई। लेकिन उनका नया संगठन नेकां जैसी राजनीतिक ताकत नहीं बन सका।शमीम अहमद शमीम और अब्दुल रशीद काबली जैसे प्रभावशाली नेता भी पार्टी से अलग होने के बाद वैसी व्यापक राजनीतिक पार्टी खड़ी नहीं कर पाए।
1984 में गुलाम मोहम्मद शाह की बगावत ने नेकां को सबसे बड़ी चुनौती दी। कई विधायकों के समर्थन से शाह मुख्यमंत्री बन गए और लगा कि पार्टी का राजनीतिक आधार बिखर जाएगा। हालांकि, उनकी सरकार 1986 में गिर गई और उनका अलग राजनीतिक संगठन भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया। नेकां अपनी राजनीतिक जमीन बचाने में सफल रही।
बाद के वर्षों में गुलाम हसन मीर और दिलावर मीर जैसे नेताओं का पार्टी से अलग होना भी नेकां के राजनीतिक प्रभाव को खत्म नहीं कर सका।
अपवाद भी रहे: सैफुद्दीन सोज और देवेंद्र राणा
हालांकि, नेकां छोड़ने वाले हर नेता की राजनीतिक कहानी असफलता की नहीं है। सैफुद्दीन सोज ने पार्टी छोड़कर कांग्रेस में महत्वपूर्ण राजनीतिक मुकाम हासिल किया और केंद्र सरकार में भी जिम्मेदारियां निभाईं।देवेंद्र सिंह राणा इसका एक और महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। जम्मू में नेकां के प्रमुख चेहरों और पार्टी के प्रांतीय अध्यक्ष रहे राणा ने 2021 में सुरजीत सिंह सलाथिया के साथ पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया।
उन्होंने 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर नगरोटा से जीत दर्ज की और 30,472 वोटों के अंतर से अपने प्रतिद्वंद्वी को हराया।राणा का उदाहरण बताता है कि किसी स्थापित पार्टी को छोड़ने के बाद भी नेता अपना राजनीतिक प्रभाव बनाए रख सकता है, खासकर जब उसे दूसरी बड़ी राजनीतिक पार्टी का संगठनात्मक समर्थन मिल जाए। लेकिन रुहुल्ला के सामने स्थिति अलग होगी, यदि वह किसी दूसरी पार्टी में जाने के बजाय अपनी स्वतंत्र राजनीतिक राह चुनते हैं।
3.56 लाख वोट: रुहुल्लाह की अपनी ताकत या नेेकां का प्रभाव?
2024 के लोकसभा चुनाव में श्रीनगर सीट से रुहुल्लाह की जीत उनकी राजनीतिक लोकप्रियता का प्रमाण है। उन्होंने 3,56,866 वोट हासिल कर अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 1,88,416 वोटों से हराया।लेकिन इस जीत के साथ एक महत्वपूर्ण सवाल भी जुड़ा है, इन वोटों में कितने रुहुल्ला की अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता के थे और कितने नेशनल कॉन्फ्रेंस के संगठन, चुनाव चिह्न और दशकों से बने राजनीतिक प्रभाव के? इसका जवाब भाषणों, इंटरनेट मीडिया या टेलीविजन बहसों से नहीं मिलेगा। असली परीक्षा तब होगी, जब वह पार्टी के संगठन और चुनाव चिह्न के बिना जनता के बीच जाएंगे।
क्या नेकां को वास्तव में नुकसान होगा?
2024 के विधानसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 90 में से 42 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सरकार बनाई। इससे स्पष्ट है कि पार्टी का संगठन और जनाधार अभी भी मजबूत है। उसकी नीतियों की आलोचना हो सकती है, लेकिन जम्मू-कश्मीर की राजनीति में उसके प्रभाव को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। यहां यह भी बताना असंगत नहीं होगा कि रुहुल्ला की बेरुखी के कारण बडगाम विधानसभा उपचुनाव में नेकां के हाथ से निकल कर पीडीपी के हाथ चला गया और नेकां की सीटें 42 से 41 हो गई।
ऐसे में यह भी कहा जा सकता है कि रुहुल्लाह के लिए पार्टी के भीतर रहकर संघर्ष करना अधिक प्रभावी विकल्प हो सकता था। वह अनुच्छेद 370, 35-A और राज्य के दर्जे जैसे मुद्दों पर नेतृत्व पर दबाव बनाए रख सकते थे। कई बार पार्टी के भीतर रहकर असहमति जताने वाला नेता बाहर खड़े नेता की तुलना में ज्यादा राजनीतिक प्रभाव डाल सकता है।
दूसरी ओर, नेकां नेतृत्व के लिए भी रुहुल्ला की नाराजगी को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। पार्टी के भीतर असहमति और वैचारिक बहस के लिए जगह नहीं बची तो इसका असर उसके युवा और समर्थक मतदाताओं पर भी पड़ सकता है।
असली परीक्षा किसकी?
रुहुल्लाह का संभावित इस्तीफा नेकां के लिए एक राजनीतिक चुनौती जरूर होगा, लेकिन उससे कहीं बड़ी परीक्षा खुद रुहुल्ला की होगी। इतिहास गवाह है कि नेशनल कान्फ्रेंस ने कई बड़े नेताओं को खोने के बावजूद अपना संगठन और राजनीतिक अस्तित्व कायम रखा है। पार्टी छोड़ना आसान है, लेकिन अपने साथ जनाधार लेकर नई राजनीतिक ताकत खड़ी करना कहीं अधिक कठिन।रुहुल्ला इस इतिहास को बदल सकते हैं और अपवाद साबित हो सकते हैं।
उनके पास राजनीतिक पहचान, स्पष्ट विचार और लोकसभा चुनाव में मिली बड़ी जीत का अनुभव है। लेकिन यह अभी तय नहीं है कि उनका व्यक्तिगत जनाधार पार्टी के संगठन से अलग भी उतना ही प्रभावशाली रहेगा। इसलिए तीन नवंबर का उनका संभावित फैसला केवल नेशनल कान्फ्रेंस के लिए शक्ति-परीक्षण नहीं होगा, बल्कि रुहुल्लाह के अपने राजनीतिक भविष्य का भी निर्णायक मोड़ बन सकता है।
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