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कभी हर कश्मीरी घर की शान थी कांगड़ी, अब हीटर ने छीनी पहचान, चरार-ए-शरीफ में विरासत बचाने में जुटे कारीगर

Published: Thu, 05 Nov 2026 07:00 AM (IST)

कश्मीर में आधुनिक हीटरों के बढ़ते चलन से पारंपरिक कांगड़ी की मांग घट रही है, जिससे इसके कारोबार और पहचान ...और पढ़ें

आधुनिक हीटरों से संकट में कश्मीरी कांगड़ी का कारोबार।

आधुनिक हीटरों से संकट में कश्मीरी कांगड़ी का कारोबार।

HighLights

  1. आधुनिक हीटरों से कांगड़ी की मांग में भारी गिरावट।

  2. चरार-ए-शरीफ के कारीगर कला बचाने को प्रयासरत।

  3. सरकार से आर्थिक सहायता और प्रशिक्षण की मांग।

राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। कश्मीर में सर्दी की दस्तक के साथ कांगड़ी बनाने का काम तेज हो गया है। कभी हर कश्मीरी घर की जरूरत रही कांगड़ी अब आधुनिक हीटरों और बिजली से चलने वाले गर्म उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल के कारण अपनी पुरानी पहचान और बाजार खो रही है। मध्य कश्मीर के बड़गाम जिले का चरार-ए-शरीफ अपनी खास कांगड़ियों के लिए जाना जाता है। यहां के कारीगर पारंपरिक कला और उससे जुड़ी रोजी-रोटी बचाने की चुनौती का सामना कर रहे हैं।

कांगड़ी मिट्टी के छोटे बर्तन को विलो (बेंत जैसी लचीली लकड़ी) की पतली पट्टियों से बुनकर बनाई जाती है। कश्मीरी लोग सर्दी में इसे फिरन के नीचे रखकर ठंड से बचते रहे हैं। यह केवल गर्माहट देने का साधन नहीं, बल्कि कश्मीर की जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। विलो-विकर शिल्प में वर्ष 2022 का केंद्र शासित प्रदेश पुरस्कार पाने वाले कारीगर बशीर अहमद डार के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में कांगड़ी की मांग काफी घटी है।

पहले लगभग हर घर में इसका इस्तेमाल होता था, लेकिन अब बिजली से चलने वाले हीटर इसकी जगह ले रहे हैं। करीब 40 से 50 वर्ष से इस काम से जुड़े डार की वर्कशाप में आठ लोग काम करते हैं। यहां हर साल लगभग पांच से छह हजार कांगड़ियां तैयार होती हैं। इनकी बिक्री मुख्य रूप से नवंबर से फरवरी तक होती है।

नए डिजाइन के जरिये बाजार में जगह बनाने का प्रयास

चरार-ए-शरीफ की पहचान इसकी खास दुल्हन कांगड़ी 'महरीन कांगड़ी' से भी है। यहां सामान्य उपयोग की कांगड़ियों के साथ दुल्हन कांगड़ी, सजावटी नमूने और छोटे आकार की कांगड़ियां बनाई जाती हैं। पारंपरिक उपयोग घटने के बावजूद कारीगर नए डिजाइन के जरिए बाजार में इसकी जगह बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं।

करीब 40 वर्ष से कांगड़ी बना रहे शब्बीर अहमद बताते हैं कि एक सामान्य कांगड़ी तैयार करने में दो से तीन घंटे लगते हैं। समय उसके आकार और डिजाइन पर निर्भर करता है।

यहां कांगड़ियों के अलावा फूलदान और बड़े सजावटी सामान भी बनाए जाते हैं। कारीगरों को घटती बिक्री के साथ नई पीढ़ी की कम होती रुचि की भी चिंता है। उनका कहना है कि युवाओं को इस हुनर से जोड़ने के लिए प्रोत्साहन नहीं मिला तो यह कला और सिमट सकती है।

कारीगरों को मिले आर्थिक सहायता व प्रशिक्षण

कारीगरों ने सरकार से आर्थिक सहायता, कल्याणकारी योजनाएं और प्रशिक्षण शुरू करने की मांग की है, ताकि युवा पारंपरिक शिल्प से जुड़ सकें। आधुनिक उपकरणों के बढ़ते चलन के बीच चरार-ए-शरीफ के कारीगर आज भी कांगड़ी बुन रहे हैं।

उनके लिए यह केवल कारोबार नहीं, बल्कि कश्मीर की उस विरासत को बचाने की कोशिश है, जिसकी गर्माहट पीढ़ियों से यहां के जीवन का हिस्सा रही है।

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