कश्मीर में महिलाओं पर पानी ढोने का बोझ, 95% मानसिक-शारीरिक थकान से जूझ रहीं; सर्वे में खुली हकीकत
कश्मीर के ग्रामीण इलाकों में पानी की किल्लत महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छता पर गहरा असर डाल रही है। ...और पढ़ें

कश्मीर में पानी की किल्लत का सबसे बड़ा बोझ महिलाओं पर (फाइल फोटो)
राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। कश्मीर के ग्रामीण इलाकों में पानी की कमी अब केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित समस्या नहीं रह गई है। इसका सीधा असर महिलाओं की सेहत, रोजगार, लड़कियों की पढ़ाई और मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता पर पड़ रहा है। कश्मीर विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में सामने आया है कि सर्वे में शामिल 95 प्रतिशत महिलाओं ने पानी से जुड़े कामों के कारण शारीरिक और मानसिक थकान की बात कही, जबकि 83 प्रतिशत परिवारों को पानी की कमी का सामना करना पड़ा। अध्ययन के मुताबिक, पानी जुटाने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से महिलाओं पर है, जिन्हें कई बार घर से दूर जाकर पानी लाना पड़ता है।
कश्मीर विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर विमेन स्टडीज एंड रिसर्च की वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर डॉ. शाजिया मलिक के नेतृत्व में यह अध्ययन भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) की वित्तीय सहायता से संचालित ‘नारी शक्ति एंड वाटर गवर्नेंस’ परियोजना के तहत किया गया। इसमें बडगाम, पुलवामा और कुपवाड़ा जिलों के 70 से अधिक गांवों की 600 महिलाओं को शामिल किया गया।
600 में से 550 घरों में महिलाएं लाती हैं पानी
डॉ. शाजिया ने बताया कि सर्वे के दौरान 600 में से 550 परिवारों में पानी लाने की जिम्मेदारी महिलाओं पर थी। यह कुल परिवारों का 91.7 प्रतिशत है। केवल 45 परिवारों में पुरुष पानी लाते थे, जबकि पांच परिवारों में यह काम साझा किया जाता था।
कुल 497 परिवारों ने पानी की कमी का अनुभव किया। वहीं, 589 महिलाओं यानी 98.2 प्रतिशत ने पानी की बुनियादी सुविधाओं को अपर्याप्त बताया। बडगाम और पुलवामा में सर्वे की गई सभी 200-200 महिलाओं ने सुविधाओं की कमी की बात कही। कुपवाड़ा में भी 200 में से 189 महिलाओं ने व्यवस्था को अपर्याप्त माना।
कई परिवारों के लिए 500 मीटर से दूर पानी
अध्ययन में सामने आया कि 122 परिवारों के लिए निकटतम जलस्रोत 500 मीटर से अधिक दूरी पर था। घर के बाहर से पानी लाने वाले 442 परिवारों में से 89 परिवारों को हर बार पानी लाने में 30 मिनट से अधिक समय लगता था। केवल 100 परिवारों को सप्ताह के सातों दिन पाइप से पानी मिलता था।
गर्मी और शुष्क मौसम में 69.2 प्रतिशत महिलाएं पाइप से पानी, 38.7 प्रतिशत प्राकृतिक झरनों या धाराओं और 22.8 प्रतिशत टैंकरों पर निर्भर थीं। इसके अलावा 19.5 प्रतिशत ने ट्यूबवेल या हैंडपंप, 16.7 प्रतिशत ने सार्वजनिक नलों और 12 प्रतिशत ने सामुदायिक कुओं का इस्तेमाल बताया। महिलाएं पानी के एक से अधिक स्रोतों का उपयोग भी करती थीं।
कामकाज, पढ़ाई और स्वास्थ्य पर असर
पानी से जुड़ी जिम्मेदारियों के कारण 568 महिलाओं यानी 94.7 प्रतिशत ने बताया कि उनके काम करने के घंटे कम हो जाते हैं। लगभग 87 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि पानी की कमी लड़कियों की शिक्षा को प्रभावित करती है। वहीं, करीब 91 प्रतिशत ने कहा कि इससे मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता बनाए रखना भी मुश्किल होता है।
सर्वे में 466 महिलाएं यानी 77.7 प्रतिशत सरकारी जल योजनाओं, जिनमें जल जीवन मिशन भी शामिल है, के बारे में अनजान थीं। केवल 134 महिलाओं को इनकी जानकारी थी। स्नातक महिलाओं में 42.1 प्रतिशत योजनाओं से परिचित थीं, जबकि निरक्षर महिलाओं में यह आंकड़ा 18.3 प्रतिशत था।
इसके अलावा, 99 प्रतिशत महिलाओं ने पानी की उपलब्धता में मौसमी बदलाव की बात कही और 98 प्रतिशत ने इसे जलवायु परिवर्तन से जोड़ा।
आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर ज्यादा बोझ
वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर डॉ. शाजिया मलिक ने बताया कि सर्वे में यह बात भी सामने आई कि उन्होंने जिन महिलाओं से भी इस दौरान बात की उनमें 295 महिलाएं यानी 49.2 प्रतिशत निरक्षर थीं और 57 यानी 9.5 प्रतिशत स्नातक थीं। कुल 85 प्रतिशत महिलाएं गृहिणी थीं। आर्थिक स्थिति के लिहाज से 55.5 प्रतिशत परिवार गरीबी रेखा से नीचे और 24 प्रतिशत अंत्योदय अन्न योजना के तहत आते थे।
अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि ग्रामीण कश्मीर में पानी की समस्या का समाधान केवल बुनियादी ढांचा बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। नियमित जलापूर्ति के साथ महिलाओं की भागीदारी, सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूकता और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों पर ध्यान देना भी जरूरी है।
