श्रीनगर, नवीन नवाज। नये कश्मीर में अमन की बयार बह उठी है। ऐसे में शरीफ खान व सेठी कुमार बड़ी उम्मीदों से वादी में आए थे, लेकिन हताश जिहादियों ने उन्हें भी नहीं छोड़ा। आखिर उनका क्या कसूर था। न तो उन्हें कश्मीर की सियासत से कोई सरोकार था और न किसी से बैर। वे तो हजारों किमी. दूर परिवार के लिए पेट पालने आए थे, पर यह जिहादियों को रास नहीं आया।

राजस्थान के ट्रक चालक शरीफ खान की हत्या के दो दिन बाद बुधवार को जिहादियों ने पुलवामा में छत्तीसगढ़ के एक युवा श्रमिक को गोली मार मौत की नींद सुला दिया। अलबत्ता, आतंकियों का यह कृत्य अप्रत्याशित नहीं है, इसकी आशंका पहले से ही सभी को थी। ऐसा कर वह दुनिया को बताना चाहते हैं कि कश्मीर के हालात बहुत खराब हैं। हकीकत यह है कि कश्मीर के सुधर रहे हालात के बीच जिहादी तत्व बौखला चुके हैं। अन्य राज्यों से श्रमिकों का कश्मीर आना यहां के हालात में बेहतरी की पुष्टि करता है। यह कश्मीर के विकास में तेजी और वित्तीय गतिविधियों के जोर पकड़ने का संकेत है।

कश्मीर छोड़ने का फरमान सुनाया था :

पांच अगस्त को जम्मू कश्मीर को अनुच्छेद 370 से मिली मुक्ति के बाद विभिन्न इलाकों में पोस्टर जारी अन्य राज्यों के श्रमिकों को कश्मीर छोड़ने का फरमान सुनाया था। कई जगह स्थानीय लोगों को धमकाया गया कि वे किसी अन्य राज्यों के व्यक्ति या श्रमिक को न घर किराए पर रखें और न उसे किसी तरह काम दें।

गर्मियों में लगभग पांच लाख रहती :

कश्मीर में अन्य राज्यों से श्रमिकों की संख्या गर्मियों में लगभग पांच लाख रहती है। अगस्त के अंत तक एक-दो हजार तक सिमट गई थी। ये वे श्रमिक थे जिन्हें स्थानीय ठेकेदारों ने किसी तरह अपने पास रखा था। जिहादियों ने अगस्त के अंत में एक दुकानदार की हत्या करने के अलावा सोपोर के तीन सेब व्यपारियों के अलावा ढाई साल की मासूम बच्ची को भी गोली मारी। एक श्रमिक को भी उन्होंने कत्ल करने का प्रयास किया था,लेकिन स्थानीय लोगों ने उसे बचा लिया।

कश्मीरियों ने जिस तरह से राष्ट्रीयविरोधी तत्वों की तमाम साजिशों के बावजूद कश्मीर में हालात सामान्य बनाने में प्रशासन का सहयोग किया है उससे सभी हैरान हैं। पांच अगस्त के बाद कई जगह पथराव और राष्टि्रविरोधी प्रदर्शन की घटनाएं हुई हैं,लेकिन इनकी संख्या और तीव्रता वर्ष 2010 और 2016 की तुलना में कहीं नहीं ठहरती।

वापस आने लगे श्रमिक :

हालात में बेहतरी के साथ कश्मीर में अन्य राज्यों के श्रमिक जो अगस्त में कश्मीर छोड़कर चले गए थे, वापस लौटने लगे। इसके साथ ही कश्मीर में बंद पड़ी दुकानें थोड़ी बहुत खुलने लगी, रुके निर्माण कार्य जोर पकड़ने लगे। स्कूल-कॉलेज भी खुल गए। लैंडलाइन और पोस्टपेड मोबाइल फोन भी बहाल हो गए। पर्यटकों के लिए एडवाइजरी भी हट गई। बागों में तैयार सेब की फसल को देश की विभिन्न मंडियों में पहुंचाने के लिए स्थानीय व्यापारी भी सक्रिय हो गए। उन्होंने आतंकी फरमानों को खुलेआम ठेंगा दिखाना शुरू कर दिया। वादी में ट्रकों के काफिले भी गांव-देहात में बागों में पहुंचने लगे।

देश-दुनिया में भी कश्मीर के हालात की बेहतरी की खबरों ने जोर पकड़ लिया, क्योंकि जो कश्मीर आता, वह स्थानीय हालात के बारे में अपनों को जरूर बताता। इससे परेशान आतंकियों ने दस दिन पूर्व अनंतनाग में स्थानीय लोगों पर ग्रेनेड से हमला किया और उसके बाद गत सप्ताह उन्होंने श्रीनगर के हरि सिंह  हाईस्ट्रीट में रेहडृी-फड़ी वालों पर ग्रेनेड दागा। इन हमलों में एक दर्जन लोग जख्मी हुए, लेकिन लोगों ने सामान्य जिंदगी को पूरी तरह बहाल करने की अपनी चाह को जिंदा रखा।

फरमान को कर रहे नजरअंदाज :

कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार मंजूर ने कहा कि कश्मीर के मौजूदा हालात में इस तरह की घटनाओं की आशंका पहले से ही थी। जिहादियों और अलगाववादियों की यहां कोई सुनता हुआ नजर नहीं आ रहा है। स्थानीय लोग उनके फरमान को जिस तरह से नजरअंदाज कर रहे हैं, उसे देखकर नहीं लगता कि कभी यहां पाकिस्तान की शह पर पलने वाले आतंकियों का कोई खौफ था या लोग उनकी सुनते थे। अब जिहादी निर्दाेष नागरिकों को विशेषकर बाहरी लोगों को कत्ल कर रहे हैं। ऐसा कर वह दुनिया को बताना चाहते हैं कि कश्मीर में हिंसा का वातावरण है। वह हालात को बिगाड़ने के लिए, यहां तरक्की की हर राह रोकने के लिए कुछ भी करने को हताश है। इन हत्याओं को भी इसी चश्मे से देखा जाना चाहिए। 

Posted By: Preeti jha

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