नवीन नवाज, श्रीनगर :

कश्मीर में सुरक्षा एजेंसियों के लिए सिरदर्द बने पत्थरबाजों पर काबू पाने और उन्हें पकड़ने के लिए जम्मू कश्मीर पुलिस ने फिर अपनी पुरानी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। इस रणनीति के तहत सादे कपड़ों में युवा पुलिसकर्मियों को उन इलाकों में तैनात कर दिया जाता है, जहां ¨हसा भड़कने की आंशका रहती है। ¨हसक प्रदर्शन शुरू होते ही विशेष ट्रेनिंग प्राप्त बिना वर्दी के पुलिसकर्मी जान जोखिम में डालकर ¨हसक तत्वों के साथ शामिल हो जाते हैं और मौका मिलते ही पथराव की अगुआई करने वालों को दबोच कर हवालात पहुंचा देते हैं। पुलिस ने शुक्रवार को अपनी इसी रणनीति के जरिए अलगाववादियों और पत्थरबाजों का गढ़ कहलाने वाले डाउन-टाउन के नौहट्टा में दो नामी पत्थरबाजों को पकड़ा है।

राज्य पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि नौहट्टा में गत शुक्रवार को हमने दो पुराने कुख्यात पत्थरबाजों मोहम्मद मुर्तजा और आदिल फैयाज अहंगर को पकड़ा है। ये उन लड़कों के गैंग के सरगना हैं जो अक्सर शुक्रवार को नमाज-ए-जुमा के बाद जामिया मस्जिद के बाहर पाकिस्तान और आतंकी संगठनों के झंडे लहराते हुए पथराव शुरू कराते हैं। कई बार इन्हें पकड़ने का प्रयास किया गया, लेकिन यह हर बार बच निकलते थे। इसलिए हमने पुरानी युक्ति से काम लिया और दो युवा पुलिस कांस्टेबल जो इस इलाके को अच्छी तरह जानते हैं, सादे कपड़ों में जामिया मस्जिद परिसर में तैनात कर दिया। इन दोनों ने पत्थरबाजों जैसे ही कपड़े पहने थे। पथराव शुरू हुआ तो ये भी ¨हसक भीड़ का हिस्सा बन गए और पथराव की अगुआई कर रहे लड़कों के पास पहुंच गए। मौका देखते ही अन्य पुलिसकर्मियों ने आंसूगैस के गोले दागे और जैसे ही वहां अफरा-तफरी मची पत्थरबाजों में शामिल पुलिसकर्मियों ने दोनों नामी पत्थरबाजों को पकड़ लिया। इन दोनों को पकड़े जाने के साथ वहां शांति हो गई। उन्होंने बताया कि पत्थरबाजों को पकड़ने के लिए ऐसी रणनीति पहले भी अपनाई जाती रही है। विशेष पुलिस दस्ता रहता है पीछे : शरारती व हिसंक तत्वों के बीच सादे कपड़ों में तैनात किए जाने वाले पुलिसकर्मियों को किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए कई बार हथियार भी दिया जाता हैं। कई बार नकली हथियार भी थमाए जाते हैं। अगर ये कभी किसी मुसीबत में घिर जाएं तो पुलिस का एक विशेष दस्ता जो अक्सर उसी इलाके में होता है, जहां ये लोग होते हैं, इशारा मिलते ही वे तत्काल पहुंच जाते हैं। वर्ष 2009 व 2010 में भी अपनाई थी ऐसी रणनीति :

संबंधित पुलिस अधिकारियों ने बताया कि वर्ष 2009 में शोपियां में दो युवतियों की मौत के बाद बिगड़े हालात और उसके बाद वर्ष 2010 में कश्मीर में हिसंक प्रदर्शनकारियों पर काबू पाने, मस्जिदों का दुरुपयोग कर हालात बिगाड़ने वाले तत्वों को पकड़ने के लिए पुलिसकर्मियों को आम लोगों की भीड़ का हिस्सा बनाकर सभी संवेदनशील इलाकों में तैनात किया गया था। इसके बाद दर्जनों पत्थरबाज व आतंकियों के साथ सहानुभूति रखने वाले तत्व पकडे़ गए थे। सादे कपड़ों में तैनात डीएसपी अयूब पंडित की हुई थी हत्या :

जून 2017 को जामिया मस्जिद में ईद से चंद दिन पहले राज्य पुलिस में सुरक्षा ¨वग के डीएसपी अयूब पंडित को शरारती तत्वों ने पीट पीटकर मार डाला था। वह भी सादे कपड़ों में तैनात थे। उनकी हत्या करने वाले शरारती तत्वों ने उन्हें पहचान लिया था और उन्हें लगा था कि वह वहां पत्थरबाजों और जिहादी तत्वों की निगरानी के लिए आए हैं। डीएसपी अयूब पंडित की हत्या के बाद कुछ समय के लिए पुलिस ने जामिया मस्जिद और अन्य इलाकों में सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों को भीड़ के बीच तैनात करने की अपनी रणनीति पर अमल रोक दिया था।

Posted By: Jagran