NC का संकट टला! उमर सरकार की बढ़ी मुश्किल तो 'ओल्ड गार्ड' ने संभाला मोर्चा, चुनौतियों से कैसे निपटे फारूक अब्दुल्ला?
जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर पनपा असंतोष फारूक अब्दुल्ला के हस्तक्षेप से फिलहाल थम गया है।

नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला (फाइल फोटो)
HighLights
फारूक अब्दुल्ला ने नेकां के आंतरिक असंतोष को संभाला
पार्टी में नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया पर नई बहस
उमर अब्दुल्ला के सामने दोहरी चुनौती बनी हुई है
नवीन नवाज , श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) के भीतर पनप रहा असंतोष फिलहाल थम गया है, लेकिन पूरे घटनाक्रम ने पार्टी में नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया को लेकर नई बहस छिड़ गई है। उमर के नेतृत्व में नई निर्णय प्रक्रिया को लेकर कहीं न कहीं पुराने और नए नेताओं के बीच तालमेल की कमी दिखी।
फारूक की सक्रियता यह दर्शाती है कि पार्टी में पूरी तरह से "पीढ़ीगत बदलाव" अभी आसान नहीं है और पुराने को नजरअंदाज करना पार्टी के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
खास बात यह है कि संकट के समय 89 वर्षीय फारूक अब्दुल्ला फिर पुराने व भरोसेमंद साथियों के साथ पार्टी के खेवनहार बनकर सामने आए। फारूक पार्टी अध्यक्ष हैं, लेकिन उपाध्यक्ष होने के नाते संगठन और सरकार की कमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला संभाल रहे हैं।
नीतिगत और राजनीतिक फैसलों में भी उमर की भूमिका प्रमुख रही है। अब पार्टी के भीतर इन्हीं फैसलों और विधायकों की राय को पर्याप्त महत्व नहीं दिए जाने को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
नेकां में असंतोष के स्वर दो वर्षों से उठ रहे थे, लेकिन नेतृत्व इन्हें सामान्य मतभेद बताकर नजरअंदाज करता रहा। बागी आगा रुहुल्ला मेहदी को छोड़ कोई बड़ा नेता खुलकर सामने नहीं आया।
तीन जून को डाचीगाम (श्रीनगर) में बैठक, इसके बाद 27 अक्टूबर को मंत्रिमंडल विस्तार ने इन मतभेदों को सार्वजनिक कर दिया। हालात ऐसे बने कि 1983 के बाद पहली बार पार्टी में विभाजन की आशंका दिखाई देने लगी।
फारूक अब्दुल्ला ने विधायकों से सीधे बात की
इस संकट को संभालने में फारूक के पुराने विश्वस्त और सातवीं बार विधायक बने अली मोहम्मद सागर की भूमिका महत्वपूर्ण रही। हालिया मंत्रिमंडल विस्तार में कैबिनेट मंत्री बने सागर ने विधानसभा अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर के साथ मिल असंतुष्ट विधायकों को मनाने, उनके बीच संवाद की रणनीति बनाई।
फारूक ने नाराज विधायकों से सीधे बातकर शिकायतें सुनीं। विधायकों की नाराजगी को नेतृत्व परिवर्तन की संगठित मुहिम मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन बड़ी संख्या में विधायकों का वरिष्ठ नेतृत्व से संपर्क करना संगठन के भीतर राजनीतिक बेचैनी का संकेत जरूर है। इस घटनाक्रम ने स्पष्ट किया है कि पार्टी के पुराने नेताओं, विधायकों और संगठनात्मक ढांचे पर फारूक की पकड़ अब भी कायम है।
क्या नेकां में आकार ले रही है दोहरी नेतृत्व व्यवस्था ?
मौजूदा घटनाक्रम ने पार्टी में जिम्मेदारियों के संभावित पुनर्संतुलन की चर्चा को हवा दी है। फारूक पार्टी अध्यक्ष और वरिष्ठ मार्गदर्शक के रूप में संगठनात्मक मामलों में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं, जबकि उमर सीएम के रूप में सरकार चलाते रहेंगे।
पार्टी के अहम राफैसलों में फारूक की भागीदारी बढ़ सकती है। अभी ऐसा संकेत नहीं कि फारूक मुख्यमंत्री की जगह लेने या सरकार की कमान हाथों में लेने की तैयारी कर रहे हैं। उनकी सक्रियता का तात्कालिक उद्देश्य पार्टी में नाराजगी थामना है।
सत्ता परिवर्तन नहीं, संगठनात्मक संतुलन असली चुनौती
नेकां के मौजूदा घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सत्ता परिवर्तन नहीं, सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना है। विधायको की अपेक्षाओं, वरिष्ठ नेताओं की भूमिका और मुख्यमंत्री के नेतृत्व के बीच संतुलन बनाना पार्टी के लिए अनिवार्य होगा। फारूक का राजनीतिक अनुभव और पुराने नेताओं के साथ उनके संबंध इस प्रक्रिया में निर्णायक साबित हो सकते हैं।
उमर को सुनिश्चित करना होगा कि विधायकों की भागीदारी और संगठन के भीतर संवाद को पर्याप्त महत्व मिले। असली सवाल यह नहीं है कि फारूक उमर की जगह लेंगे या नहीं, बल्कि यह है कि नेकां की भावी राजनीतिक और संगठनात्मक निर्णय प्रक्रिया कैसी होगी।
उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व के लिए क्या हैं मायने?
उमर के सामने दोहरी चुनौती है। उन्हें एक ओर सरकार के कामकाज, प्रशासनिक प्राथमिकताओं और जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरना है, वहीं दूसरी ओर पार्टी के विधायकों व वरिष्ठ नेताओं को साथ लेकर चलना जरूरी है।
सरकार चलाने व संगठन संभालने की चुनौतियां अलग-अलग होती हैं। यदि विधायकों को लगे कि महत्वपूर्ण फैसलों में उनकी राय की अनदेखी हो रही है, तो इसका असर पार्टी की एकजुटता पर स्वाभाविक है।
फारूक की सक्रियता को उमर के नेतृत्व के विकल्प के बजाय संगठन संवाद प्रक्रिया संतुलित करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है।
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