बजट आवंटन नहीं... फिर भी 158.29 करोड़ के बिल, जम्मू-कश्मीर के सिस्टम पर कैग के सवाल; कहां-कहां मिलीं खामियां?
कैग ने जम्मू-कश्मीर की वित्तीय निगरानी प्रणाली पर सवाल उठाए हैं, जिसमें बजट आवंटन के बिना 158.29 करोड़ रुपये के ...और पढ़ें

जम्मू-कश्मीर की वित्तीय प्रणाली पर कैग की रिपोर्ट। (फाइल फोटो)
HighLights
बजट आवंटन के बिना 158.29 करोड़ रुपये के बिल बने।
वित्तीय प्रणालियों में बिल राशि और रिकॉर्ड में अंतर मिला।
एकीकृत वित्तीय प्रबंधन प्रणाली में कई गंभीर खामियां।
नवीन नवाज, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में सरकारी धन के आवंटन से लेकर बिल निर्माण और भुगतान तक निगरानी के लिए बनाई गई एकीकृत वित्तीय प्रबंधन प्रणाली की कार्यप्रणाली पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने गंभीर सवाल उठाए हैं। कैग की लेखापरीक्षा में खुलासा हुआ कि वित्तीय वर्ष 2021-22 और 2022-23 के दौरान संबंधित बजट आवंटन के बिना ही 158.29 करोड़ रुपये के बिल तैयार किए गए।
यही नहीं, एक ही बिल की राशि अलग-अलग सरकारी प्रणालियों में अलग दर्ज मिली, जबकि वित्तीय रिकार्ड में बदलाव किसने और कब किया, इसका पूरा डिजिटल ब्योरा भी उपलब्ध नहीं था। रिपोर्ट में वित्तीय नियंत्रण, साइबर सुरक्षा, इलेक्ट्रानिक बिलिंग और परियोजना के क्रियान्वयन में कई खामियां उजागर की गई हैं।
जम्मू-कश्मीर से संबंधित कैग की रिपोर्ट संख्या तीन, वर्ष 2026, 30 सितंबर 2026 को विधानसभा में पेश की गई। इसमें मार्च 2023 को समाप्त अवधि से संबंधित वित्तीय प्रबंधन की कमियों को रेखांकित किया गया है।
बजट आवंटन के बिना 158.29 करोड़ के बिल
कैग के अनुसार, वर्ष 2021-22 में पांच आहरण एवं संवितरण अधिकारियों ने 47 योजनाओं के तहत 75.06 करोड़ रुपये के बिल तैयार किए, जबकि बजट आवंटन निगरानी प्रणाली में संबंधित आवंटन उपलब्ध नहीं था। इसी तरह, वर्ष 2022-23 में छह अधिकारियों ने 51 योजनाओं के तहत 83.23 करोड़ रुपये के बिल तैयार किए, जबकि इन योजनाओं के लिए संबंधित बजट आवंटन दर्ज नहीं था।
दोनों वर्षों की कुल राशि 158.29 करोड़ रुपये है। बजट उपलब्धता और सरकारी खर्च पर नियंत्रण सुनिश्चित करने के लिए विकसित प्रणाली में ऐसी खामी वित्तीय निगरानी की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती है। हालांकि, बिना बजट आवंटन बिल तैयार होने का अर्थ अपने आप में यह नहीं है कि पूरी राशि का भुगतान हुआ या धन का गबन किया गया।
एक ही बिल की रकम में अंतर
लेखापरीक्षा में वित्तीय आंकड़ों की विसंगतियां भी सामने आईं। जम्मू-कश्मीर भुगतान प्रणाली में दो बिलों की राशि क्रमशः 17,090 रुपये और 25,800 रुपये दर्ज थी, लेकिन कोषागार नेटवर्क प्रणाली में यही रकम क्रमशः 17,190 रुपये और 48,512 रुपये पाई गई।
वित्त विभाग ने इन अंतरों को मार्च में अधिक लेनदेन के कारण पैदा हुई तकनीकी समस्या बताया और कहा कि बाद में इन्हें ठीक कर दिया गया। कैग ने इस स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि इनमें से एक मामला जनवरी का भी था।
कैग के अनुसार, बजट आवंटन निगरानी प्रणाली, जम्मू-कश्मीर भुगतान प्रणाली और कोषागार नेटवर्क प्रणाली में रिकार्ड में बदलाव का इतिहास रखने वाली तालिकाएं तो थीं, लेकिन उनमें प्रत्येक लेनदेन का पूरा विवरण सुरक्षित नहीं था। ऐसे में यह पता लगाना कठिन था कि रिकार्ड किसने तैयार किया, किसने उसमें बदलाव किया और बदलाव कब हुआ। नौ लेनदेन में व्यय के विस्तृत मद अलग-अलग मिले। कुछ मामलों में योजना संकेतांक तथा संबंधित अधिकारियों के संकेतांकों में भी अंतर पाया गया।
बिलों की जांच और मंजूरी की व्यवस्था कमजोर
कैग ने बिल तैयार करने और उनकी जांच करने की अलग-अलग जिम्मेदारियों वाली व्यवस्था में भी खामी पकड़ी। रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर भुगतान प्रणाली में जांचकर्ता की भूमिका में प्रवेश करने वाला व्यक्ति एक विशेष कड़ी के जरिये निर्माता का कूटशब्द डाले बिना ही उसके अधिकार हासिल कर सकता था। इससे वित्तीय लेनदेन पर आंतरिक नियंत्रण कमजोर पड़ने की आशंका थी। वित्त विभाग ने इस कमी को स्वीकार करते हुए बताया कि राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र ने इसे ठीक करने पर सहमति जताई थी।
12 में से केवल चार माड्यूल चालू
एकीकृत वित्तीय प्रबंधन प्रणाली की परियोजना मार्च 2010 में शुरू हुई थी। इसका उद्देश्य बजट आवंटन से लेकर भुगतान तक की प्रक्रिया को डिजिटल और पारदर्शी बनाना था। लेकिन कैग के मुताबिक, मार्च 2023 तक प्रस्तावित 12 मॉड्यूल में से केवल चार ही पूरी तरह चालू हो पाए थे।
परियोजना के निर्धारित लक्ष्यों और केंद्र सरकार के निर्देशों के अनुरूप विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन में संशोधन नहीं किए जाने के कारण जम्मू-कश्मीर को 11.88 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता नहीं मिल सकी। राज्य आंकड़ा केंद्र के उन्नयन के लिए निर्धारित 5.26 करोड़ रुपये के इस्तेमाल में भी कमियां मिलीं।
आपदा की स्थिति में वित्तीय प्रणाली बहाल करने के लिए प्रस्तावित लगभग 97.50 लाख रुपये की पुनर्बहाली व्यवस्था मार्च 2024 तक अलग से स्थापित नहीं हुई थी। मुख्य प्रणाली का बैकअप भी उसी परिसर में रखा गया था, जहां मुख्य अनुप्रयोग संचालित हो रहे थे। इससे किसी बड़ी आपदा की स्थिति में मुख्य प्रणाली के साथ बैकअप प्रभावित होने का जोखिम था।
ई-बिलिंग के बावजूद जारी रही मैनुअल प्रक्रिया
वित्त विभाग ने मई 2019 से कोषागारों में केवल इलेक्ट्रॉनिक बिलों के प्रसंस्करण का निर्देश दिया था। इसके बावजूद कोषागार अधिकारी ऑनलाइन बिल तब तक प्राप्त नहीं कर पाते थे, जब तक संबंधित अधिकारी बारकोड वाले दस्तावेज और अन्य जरूरी कागजात लेकर नहीं पहुंचते थे।
वर्ष 2021-22 में 317 अधिकारियों ने 11,534 गैर-पेंशन बिलों का निपटारा मैनुअल प्रक्रिया से किया। वर्ष 2022-23 में 158 अधिकारियों ने इसी तरीके से 2,281 बिलों का प्रसंस्करण किया। इससे डिजिटल व्यवस्था लागू होने के बावजूद कागजी प्रक्रिया पर निर्भरता उजागर हुई।
लाभार्थियों के रिकार्ड में हजारों दोहराव
सरकारी भुगतान पाने वाली एजेंसियों और लाभार्थियों के आंकड़ों में भी बड़ी संख्या में दोहराई गई प्रविष्टियां मिलीं। वर्ष 2021-22 में ऐसी 24,023 प्रविष्टियां थीं, जो 2022-23 में बढ़कर 34,188 हो गईं। कुछ मामलों में एक ही विक्रेता अलग-अलग वस्तु एवं सेवा कर पहचान संख्याओं के साथ दर्ज था। प्रणाली पहचान संख्या की वैधता जांचती थी, लेकिन दोहराई गई प्रविष्टियों को रोकने के लिए पर्याप्त स्वचालित नियंत्रण नहीं थे।
साइबर सुरक्षा पर भी चिंता
कैग ने परियोजना के निर्धारित गुणवत्ता और सूचना सुरक्षा मानकों के अनुरूप आवश्यक प्रमाणन की कमी पर भी सवाल उठाए। रिपोर्ट में मई 2025 में जम्मू-कश्मीर भुगतान प्रणाली समेत सरकारी वेबसाइटों के साइबर सुरक्षा प्रोटोकॉल, सुरक्षा कमजोरियों के आकलन और प्रवेश परीक्षण से जुड़े अनुपालन के मुद्दों का उल्लेख किया गया है। जोखिमों का व्यवस्थित ब्योरा रखने वाले रजिस्टर की कमी और कुछ मामलों में अनौपचारिक ई-मेल खातों के इस्तेमाल पर भी ध्यान दिलाया गया।
जवाबदेही तय करने की जरूरत
कैग की रिपोर्ट सरकारी वित्तीय निगरानी व्यवस्था में नियंत्रण और पारदर्शिता मजबूत करने की जरूरत रेखांकित करती है। बजट आवंटन के बिना करोड़ों रुपये के बिल तैयार होना, एक ही लेनदेन की रकम में अंतर, रिकॉर्ड में बदलाव का अधूरा डिजिटल ब्योरा और ई-बिलिंग के बावजूद मैनुअल प्रक्रिया जारी रहना गंभीर संस्थागत कमियों की ओर संकेत करते हैं।
इन खामियों को दूर करने के लिए बजट नियंत्रण मजबूत करना, विभिन्न प्रणालियों के आंकड़ों का नियमित मिलान, प्रत्येक बदलाव का सत्यापन योग्य रिकॉर्ड और साइबर सुरक्षा मानकों का प्रभावी अनुपालन जरूरी है। साथ ही, सामने आई विसंगतियों की जांच कर जिम्मेदारी तय करना भी अहम है। सरकारी धन की डिजिटल निगरानी तभी विश्वसनीय होगी, जब बजट आवंटन से अंतिम भुगतान तक हर चरण का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध हो और किसी भी गड़बड़ी की जवाबदेही तय की जा सके।
