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सेब के पेड़ों की टहनियां जलाने से कश्मीर में बिगड़ी हवा, सांस के मरीजों की बढ़ी आफत; विशेषज्ञों ने दिया नया सुझाव

Published: Sat, 07 Nov 2026 02:08 PM (IST)

दक्षिण कश्मीर में सेब की टहनियां जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, जिससे बुजुर्गों और बच्चों में सांस संबंधी ...और पढ़ें

सेब की टहनियां जलाने से दक्षिण कश्मीर में बढ़ा वायु प्रदूषण। (AI Generated)

सेब की टहनियां जलाने से दक्षिण कश्मीर में बढ़ा वायु प्रदूषण। (AI Generated)

HighLights

  1. सेब की टहनियां जलाने से दक्षिण कश्मीर में धुआं फैल रहा।

  2. वायु गुणवत्ता गिरी, सांस के मरीजों की बढ़ी दिक्कतें।

  3. विशेषज्ञों ने सुरक्षित निपटारे के विकल्प सुझाए, जैसे भेड़ चराना।

जागरण संवाददाता, श्रीनगर। दक्षिण कश्मीर में सेब की फसल का सीजन समाप्त होते ही बागों में पेड़ों की छंटाई शुरू हो गई है। इसके साथ ही बची टहनियों और सूखी डालियों को जलाने का सिलसिला भी तेज हो गया है। इससे उठने वाले धुएं के कारण कई इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक तेजी से गिर रहा है। सांस और अस्थमा की बीमारी से जूझ रहे बुजुर्गों तथा बच्चों की परेशानी बढ़ रही है। कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों ने चिंता जताते हुए प्रशासन से टहनियों के सुरक्षित निपटारे के विकल्पों को बढ़ावा देने की मांग की है।

शोपियां, पुलवामा और कुलगाम जैसे सेब उत्पादक जिलों में शाम के समय बागों से उठता धुआं मोटी परत की तरह फैल जाता है। किसान छंटाई के बाद बची टहनियों और डालियों को जलाते हैं। इनका इस्तेमाल स्थानीय स्तर पर सर्दियों के लिए चारकोल बनाने में भी होता है।

दशकों से चली आ रही यह प्रथा ग्रामीण परिवारों को ईंधन का आसान स्रोत देती है, लेकिन इससे हवा में धुआं और बारीक कण घुलते हैं। ठंड के मौसम में हवा स्थिर रहने से प्रदूषक जमीन के करीब जमा हो जाते हैं। हवा की गुणवत्ता में गिरावट सांस की पुरानी बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए तकलीफदेह हो सकती है।

बागों में बायोमास जलाने से बढ़ रहा धुआं

दक्षिण कश्मीर के निवासी मुख्तार अहमद ने बताया कि बायोमास जलाने से हवा की गुणवत्ता खराब होती है और सीओपीडी के मरीजों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ता है। उनके पिता फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित हैं।

अहमद के मुताबिक, आसपास के बागों से आने वाला धुआं उनके पिता की स्थिति बिगाड़ता है। शाम को पूरे इलाके में धुआं फैलने पर उन्हें सांस लेने में भी परेशानी होती है।

भेड़ चराने का विकल्प सुझा रहे कृषि विज्ञानी

शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी आफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलाजी ऑफ कश्मीर (एसकेयूएएसटी-के) और बागवानी विभाग समय-समय पर किसानों को बागों के कचरे के बेहतर प्रबंधन की सलाह देते रहे हैं।

विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञानियों ने कहा कि कचरा जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है और मिट्टी के लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट होते हैं। विज्ञानियों ने टिकाऊ विकल्प के तौर पर बागों में भेड़ चराने का सुझाव दिया है।

भेड़ें गिरी हुई पत्तियां खाती हैं और उनका मल मिट्टी में जैविक पदार्थ मिलाकर उसकी उपजाऊ क्षमता बढ़ाता है। यह तरीका उन बागों के लिए उपयुक्त है, जहां टहनियों की छंटाई जमीन से कम से कम दो फीट ऊपर की जाती है, ताकि भेड़ें पेड़ों के नीचे आसानी से घूम सकें।

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