जागरण संवाददाता, कठुआ : चन्नग्रां गांव में जारी श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन डुग्गर प्रदेश के आत्मवेत्ता संत सुभाष शास्त्री जी महाराज ने उपस्थित संगत से कहा कि आज संसार में हर कोने में अशांति व्याप्त है कारण मानव का मानव के प्रति प्रेम का ना होना। जैसे पाप का फल कभी दुख नहीं हो सकता क्योंकि पुण्य का फल ही सुख होता है, वैसे ही बिना प्रेम के जीवन नीरस है। बिना प्रेम के जीवन सफल ही हो ही नहीं सकता और जैसा मानव प्रेम नाशवान दुनिया से क्या करता, क्या वैसा प्रेम भगवान से नहीं हो सकता।

शास्त्री ने कहा यदि अविनाशी से प्रेम करना चाहते हैं तो सर्वप्रथम सत्य को जानने का प्रयास करो क्योंकि जब साधक के मन में जगत की असत्यता पर विचार आता है तब फिर उसे इस नश्वर संसार के ऊपर घृणा होकर प्रभु के साथ प्रेम का बढ़ावा होता है और वह उस प्रेम के द्वारा फिर प्रभु को प्राप्त करने की चेष्टा से उसका ध्यान चितन व तप-दान आदि शुभ को प्राप्त करता है ,पर इतना करने पर भी उसका मन टिकता नहीं, यानि स्थिर नहीं होता, इसलिए वह फिर स्थिरता पाने के लिए प्रेम की दूसरी सीढ़ी पर चढ़ने का प्रयास करता है अन्तत: इसमें सफलता प्राप्त कर लेता है ।

शास्त्री ने कहा कि जिस साधक को प्रेम के द्वारा प्रभु को प्राप्त प्राप्त कर लेते हैं,उस प्रभु को प्रेमीजन प्रेम पाश में बांधकर सदा ही अपने पीछे फिराते हुए नट भांति खेले खिलाते व नचाते हैं। धन्य हैं ऐसे प्रेमीजन जिन्होंने सर्वस्व को त्याग कर अपना आप भी हरि चरणों पर न्योछावर कर दिया है और घर, बाहर, स्त्री, पुत्र, धन,माल आदि को विष के तुल्य है।अत: ऐसे भक्तों को फिर भगवान सर्वत्र दिखाई देते हैं वह मायाधारियों से तो वह कोसों दूर ही हैं। यह प्रेम करने का फल और ऐसे प्रभु प्रेमी किसी मानव की तो क्या किसी जीव से भी कभी घृणा नहीं करते।

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